ख़्वाब
By Ananth
अजब था ख़्वाब रात का
सफ़र पे मुझको ले गया
वो वक़्त बीते और आने वाले से भी मेरा रु-ब-रु कराके
मुझको मुझमें लाके फिर से छोड़कर चला गया
अजब था ख़्वाब रात का
वो ले गया मुझे पुरानी गलियों में
जहाँ मैं खेला करता था “क्रिकट”
जो दूर से मैं दौड़कर के “बॉल” फेंकने को आया करता था
वो दूरी सिर्फ़ चार ही क़दम की थी जो नापा उसको मैंने अब
मोहल्ले के वो सारे घर भी छोटे लग रहे थे मुझको
ये मैं सोच ही रहा था जैसे
एकदम वो मुझको आके जैसे पंखों पे उड़ाके ले गया कहीं तो और ही
इमारत एक ऊँची सी
मकान जिसमें आजकल है मेरा उसके जैसी ही
मुझे वो छत पे ले गया
मैं देख ही रहा था सारे तारे जब हवा चली जो कानों में मेरे कही
की आसमाँ से आज भी तुम उतना दूर ही तो हो
मगर जमीं से फ़ासला जो था तुम्हारा, बढ़ गया
अजब था ख़्वाब रात का
वो ले गया मुझे किसी दुकान में अतीत के
कि जिसमें एक बच्चा मेरी शक्ल वाला रो रहा था
ज़ोर ज़ोर से, न जाने क्या ना पाके
और रोते रोते घर पहुँचके जिसने अपनी खोली एक छोटी “डाइअरी”
लिखी फिर उस मनहूस दिन की “डेट” और फिर
उतारे अपने मन के आतिशीं ख़याल सारे
ख़ूब कोसा उसने अपनी माँ को और बाप को
सुलग रही थी “डाइअरी” वो
झेल कैसे पाती ऐसी आग को
मगर धुआँ दिखा नहीं मुझे उस आग का कहीं
मैं ढूँढने लगा धुआँ था जैसे ही वो मंज़र और कुछ ही बन गया
मैं एक कमरे में खड़ा था अस्पताल या “क्लिनिक” के
और मुझको हंसते हंसते तक रहा था
एक चेहरा जाने किसका
कह रहा, “बधाई हो! बधाई हो!”
और पीठ पे वो थपकियाँ था दे रहा
थमायी मेरे हाथों में फिर उसने नन्ही जान एक
चेहरा जिसका देखके मैं हंस पड़ा, मैं रो पड़ा
दिखाई दे गया मुझे वो “डाइअरी” का तब
अजब था ख़्वाब रात का
By Ananth

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