ख़ाली सी ज़िंदगी
By Prakash Kumar Shukla
इस ख़ाली सी ज़िंदगी में कुछ उम्मीद के अफसाने दे, मुझे डर है डर के न होने का, मुझे खौफ़ के बहाने दे।
गुरूर की वज़ह तो दे कि उसके टूटने का खौफ़ हो, कर बेदर्द मुझको,या वो इंसा कि जिसके दिल मे रौफ़ हो।
वो हुनर तो दे - जिसकी नुमाईश कर सकूँ, मौके भी दे कि अपनी आज़माईश कर सकूँ।
दे कोई हमदर्द ऐसा, जो रास्ते में छोड़ दे, ज़ब्त करके दिल मेरा,फिर उसी को तोड़ दे।
दे उचाईयाँ मुझे, ज़मीं की आरज़ू समझ सकूँ, फिर ला पटक ज़मीं पे, मैं जो हूँ - वही रहूँ ।
कुछ नुक्स दे, उन्हे मिटाने का ज़रिया दे, दूसरों में खुद को पाऊँ, ऐसा नज़रिया दे ।
दे बारिशें, करने को तर-तर हर मंजर, खुश्क लब रहें, इक बूँद की तड़प करे असर।
शोर कितना है दुनिया में-मुझे बहरा कर दे, या ज़हन में ख़ामोशी का असर गहरा कर दे
By Prakash Kumar Shukla

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