ख़ता बस इतनी थी…
By Bhavya Barai
क्या मेरी ख़ता यही थी,
कि मैंने दिल से चाहा?
हर बार किसी की मुस्कुराहट में
अपना सुकून छुपा लिया।
हमने तो सिर्फ़ मोहब्बत की,
और तुमने बस पलट कर देखा भी नहीं।
जब ज़रूरत पड़ी, याद आ गए हम
और हम भी क्या, बेवक़ूफ़ ही सही,
फिर से लौट आए वहीं।
तुम्हारे लफ़्ज़ों का जादू था,
या मेरी तन्हाई का साया,
पता नहीं।
बस इतना जानता हूँ,
कि हर दफ़ा तोड़ने वाले के लिए
मैं ही जुड़ता गया।
क्या ग़लती थी मेरी,
कि दिल साफ़ था?
कि हर रिश्ते में
खुद को पूरा डाल दिया?
और जब तुमने रुख मोड़ लिया,
मैं बस ख़ामोशी से मुस्कुराया
क्योंकि बेवक़ूफ़ तो मैं था ही,
पर बेवफ़ा कभी नहीं।
By Bhavya Barai

Well written🩶
Raw emotions🤌
Beautifully written
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