ख़ंजर और गर्दन
By Sanjay Kumar Upadhyay
रूह मेरी नोच कर खा जायेंगी ये ,
ख़्वाहिशें जो इस क़दर दबती रहीं..!
रात की रंगीनियाँ तो, बस मिलेंगी गुफ़्तगू में,
चाँदनी जो इस क़दर ढलती रही …!
बुझ न पाया ये दिया, सौ आँधियों से ,
वक्त की लाठी, भले बेवक्त ही चलती रही…!
चुन ही देना तुम भी मुझको , पत्थरों में ,
ग़र ख़ंजरों की गर्दनों से, इस क़दर बनती रही…!
By Sanjay Kumar Upadhyay

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