क्षितिज
By Monica Banerjee
इल्म है मुझे
कि मन के रथ की वल्गा को
कसने का फ़रमान जारी है
बेमानी ही सही, पर
लाचार वासना को साँस भर लेने की इजाज़त है।
टुकड़ों में सानिंध्य?
किश्तों में सामीप्य?
मेरे मन! पराकाष्ठा में रहना इसी को कहते हैं
लेकिन अनुदान स्वरूप अनुराग क्योंकर हो?
अम्बर तो कभी न चाहा
धरती पर ही कदम जो सुदृढ़ थे मेरे
पर क्षितिज का एक सूक्ष्म कोना
माँग लेना भी शायाद नाजायज़ हो।
By Monica Banerjee

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