क्रोध राग
By Pradnesh Tari
भूलजाए अपनों को तू क्षणभर
याद न रहे
जो दिलदार थे कभी हमपर
बोल जाए तू इतना कुछ
कि दूर जाए तेरे अपने खुद
कर बैठे शब्दों के घाव ऐसे
लग जाए तीरों के बान जैसे
शब्द से ही घायल कर जाए तू
क्रोध राग क्यों कर जाए तू
होश ना रहे तुझे तब तुझ पर
कर बैठे ऐसा की पछतावे तू खुदपर
शरीर के घाव तो भर जाए हल्दी से
मन के घाव ना मिट पाए तू जल्दी से
क्रोध राग क्यों कर जाए तू ?क्रोध राग क्यों कर जाए तू?
क्रोध तेरा तुझे अकेला कर जाएगा
लाखों में तू हमेशा अकेला ही पाएगा
करलें काबू खुद से अपने क्रोध पर
नहीं है बस मैं ?
तो क्या अकेला जी पायेगा?
खुद कर ले काबू वरना वह तुझे कर जाएगा
मानव से दानव जल्दी ही तू बन जाएगा........
क्रोध राग क्यों कर जाए तू ?
क्रोध राग क्यों कर जाए तू?
By Pradnesh Tari

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