क्यों मांगते हो?
By Amit Sharwa
भरे ज़ख्मो से निशान क्यों मांगते हो
सूखे पत्तों से जान क्यों मांगते हो
तेरी उल्फ़त ने बदला है मुझको
पहले जैसा इंसान क्यों मांगते हो
दगाबाज़ी के शौक जो पाले थे
अब हमसे इमान क्यों मांगते हो
दिल का कमरा ये ख़ाली था कब से
मजमे में अब वीरान क्यों मांगते हो
ख़ालिस हीरे कि रखते परख हो
फिर फ़रेबी जहान क्यों मांगते हो
हर प्यासे का तो तु है समंदर
सूखा ये रेगिस्तान क्यों मांगते हो
हर फूल सिमट जाता है एक रोज
नौजवाँ गुलिस्तान क्यों मांगते हो
हम पे बरपा दी सारी क़यामत
ज़ख़्म खुद पे नादान क्यों मांगते हो
बख्श देते थे तुम तो खुदा भी
काफ़िरो से एहसान क्यों मांगते हो
बसते हो जो 'मीत' के रग रग में
फिर भी टूटा मकान क्यों मांगते हो
By Amit Sharwa

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