क्या तुम घर हो मेरे।
By Ajeet Singh
कुछ दीवारें ईंटों से सजा कर
और छत को ओढ़ कर
घर तो बना
पर अंधेरा जो
रोशनी की राह
तकता रह गया
वहीं दीवारों से रोज़
चीख़ों का हाथ पकड़
कर खेला करता है
ये घर जो बना है
यहाँ कमरे ख़ाली हैं
ये घर जो बना है
यहाँ मंदिर का दिया
अक्सर बस जला करता है
बहुत उदास हैं दरवाज़े यहाँ
इस घर में आँगन
कदमों की आहट
ढूँढता बहुत चुप सा है
तू अगर टूट जाएगा
तो फिर ईंटों से
सजी दीवारें लौटेंगी
तू क्या घर बनेगा कभी
तू क्या रोशन होगा कभी
By Ajeet Singh

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