क्या कहीं आज भी ज़िंदा हो तुम मेरे बगै़र
By Jaya Bhardwaj
क्या कहीं आज भी ज़िंदा हो तुम मेरे बगै़र,
मुझसे दूर ।
क्या कहीं आज भी ज़िंदा हो तुम
तो शायद उस वक्त के, वो वादे सब ख़याली थे
इसलिए शायद मेरे, जज़्बात भी सवाली थे।
एक वक्त था जब कुछ तो था, दरमियां अपने
क्योंकि तुम्हीं मेरी होली थे, और तुम्हीं दिवाली थे।
तो क्या कहीं आज भी ज़िंदा हो तुम मेरे बगै़र,
मुझसे दूर।
जो भी हो पर अब नहीं तेरे जाने का एहसास- ए- ग़म
ये जो भी था सब दरमियां एक उम्र का तकाज़ा था,
और फिर हम-तुम इक वक्त में आशिक़ और मवाली थे।
तो क्या कहीं आज भी ज़िंदा हो तुम।
उन ज़िंदा दफ्न ख्यालों के साथ,
जो करते इक वक्त पर इस रिश्ते की रखवाली थे।
क्योंकि हम-तुम भी इक वक्त में आशिक़ और मवाली थे।
क्या कहीं आज भी जिंदा हो तुम मेरे बगै़र,
मुझसे दूर।
By Jaya Bhardwaj

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