क्या करूँ
By Surabhi
क्या करूँ जो सुकून मिले
दिल में नयी धड़कन खिले
अंदर जैसे घुटन सी है
जाने क्या टूटा जो चुभन सी है
उसको गए ज़माना हुआ
वो प्यार अब फक़त फ़साना हुआ
फिर क्यों घिरा ये कश्मकश में है
एक सैलाब सा अंदर अब भी है
अब दम तोड़ दूं या दुनिया छोड़ दूं
या दूं सब्र का इन्तेहाँ, सब खुद ही में पिरो लूं
क्या करूँ जो सुकून मिले
दिल में नयी धड़कन खिले
दूर कर दिया सारी यादों को
भुला दिया उन सारी बातों को
वो मंजर आँखों में आज भी है
नमीं पलकों में बेहिसाब आज भी है
अब आँखें मूंद लूं या जीना छोड़ दूं
या हर रात तकिये को तेरा सीना समझना छोड़ दूं
क्या करूँ जो सुकून मिले
दिल में नयी धड़कन खिले
वो मन्नत का धागा
जो मैंने कभी बँधा था
खोल आऊं क्या उसको अब
जीसमें मैंने उसको माँगा था
अब वो धागा तोड़ दूं या शहर छोड़ दूं
या ज़ख्मों को वक्त के हवाले छोड़ दूं
क्या करूँ जो सुकून मिले
दिल में नयी धड़कन खिले
By Surabhi

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