क्या उसे भूल जाना आसान था?
By Sneha Kumari
अक्सर यूंही चलते हुए राह में
जब कोई जाना-पहचाना चेहरा टकरा जाता है
थम कर दो घड़ी बात करके
फिर वही सवाल पूछ जाता है।
क्या उसे भूल जाना आसान था?
मैं भी थम जाती हूँ
अश्कों की धारा को छुपाती हूँ,
सर को थोड़ा झुकाती हूँ
हवा से बहानों का पिटारा मंगवाती हूँ,
कर के फिर सोच-विचार
ज़मीन को फिर दबी आवाज़ में बताती हूँ।
हां।
हां आसान था।
जब बेवजह तुमने बीच सड़क में हाथ छोड़ा था
बेबुनियाद बातों के कारण नाता तोड़ा था,
जब मेरी बातों को मज़ाक समझा था
जब अपने रिश्ते को जुदाई से जोड़ा था।
चीर गई थी बातें वो दिल को
पर उन्हें भूल जाना आसान था।
जब संजोहे हुए ख्वाबों के आश्रय को झंझोड़ा था
जब नादान से इस दिल को दो लफ्जों से तोड़ा था,
बहते अश्कों को तुमने न बटोरा था
जब उस रात मेरे जीवन में छाया अंधेरा था।
उस लम्हें में जीने की आस खत्म हो गई थी
पर उन्हें भूल जाना आसान था।
आज भी फोन के स्पीड डायल पर तुम्हारा नाम दिखता है
मन पसीजता है, दिल आज भी रोता है,
जब अपनी गैलरी पर उंगली फिरती है
और उस पर मानों तुम्हारा राज सा दिखता है,
वो फोन के औटोकरेक्ट से तुम्हारा नाम मिटाना असंभव लगता है।
और हां आज भी मिलने के बहाने ढूंढती हूं
टकराओगे तुम राह में बस यही सोचती हूं,
गर, गर इसे भूलना कहते हैं
तो हां तुम्हें भूल जाना आसान था।
By Sneha Kumari

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