कोई मौत के घर ले चलो, वाकई बोहोत खूबसूरत होगा
By Aayu Sharma
कोई मौत के घर ले चलो, वाकई बोहोत खूबसूरत होगा
लौटा नहीं जहाँ से कोई, ऐसा ही एक हैरत होगा
जो होगा समाज और रिवाज की बेड़ियों से दूर
जहाँ सिर्फ मज़हब-ए-मोहोब्बत का सीरत होगा
जिस कोक में जन्मी वो अब पिंजरा बन चूका है
की अब उड़ जाऊ तो ज़िल्लत और रह जाऊ तो ज़लालत होगा
तेरी तरह ही ज़रूरत में लफ्ज़ नहीं आये
उनको भी तेरी तरह कोई और मिल गया होगा
कब तक एक तख्ती में दिल हल्का करते रहेंगे
भर जाएगी एक दिन और उसे भी एक दिन विदा करना होगा
जलाती रहती है ज़िन्दगी जहाँ ज़ख्म लगे हुए है
वो वस्ल ऐ मौत से ही मेरा सितम रुख़्सत होगा
By Aayu Sharma

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