कोई ख़ास नहीं था
By Sheikh Wasim Mustafa (Sheikh Sahab 007)
वैसे तो मेरा कभी,
कोई कुछ ख़ास नहीं था
वो सिर्फ़ देखती,
शायद वक्त ख़ास नहीं था
उसे चाहते तो सभी,
पर कोई ख़ास नहीं था
एक मैं ही था जो,
उसका ख़ास नहीं था
एक रोज उसके दीवारों ने,
मेरी हर आह सुन ली
वहां पहरा तो था,
मगर कुछ ख़ास नहीं था
वो दौड़ी आई,
किसी ख़ास के तलाश मे
वहां आशिक तो था,
पर वो ख़ास नहीं था ।
By Sheikh Wasim Mustafa (Sheikh Sahab 007)

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