कैसे कह दिया तुमने
By Gaganajit Singh
हवा तो थी पर तेरी महक नहीं थी साथ में
मैं फिर चला अकेला उसी तन्हा रात में
बातें तो बहुत की मैंने तुझसे मगर
वो बात कहां कि हाथ हो तेरे हाथ में
सांसों को मेरी कुछ महसूस तो हुआ
पर तेरी जैसी महक कहां इन फूलों की जात में
सोया नहीं लम्बे अरसे से मैं
सुकूं तो तब मिले जब सिरहाने हो तेरी गोद और सिर हो तेरे हाथ में
कैसे कह दिया तुमने कि अकेला हूं मैं
कभी दूर से देखना मुझे किसी चांदनी रात में
निभानी होती तो हम भी निभा देते रस्में मोहब्बत
मगर दम नहीं था उस कातिल के जज्बात में
बस हो चुका रुसवाई से मनाने तक का सफर
अब मुझे तन्हा छोड़ दें ऐ जमाने अपने जमाने के साथ में
मेरी फितरत बरगद जैसी ही है
शाखें कटी पर निगाहें फिर भी आसमां में
By Gaganajit Singh

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