कुरबत में
By Abhishek Choudhary
ग़म-ए-फुरकत की दहशत में
नींद आती है कुर्बत में।
अब तो ख्वाब में भी खुदा नज़र आते है
मैं कहीं मर तो नहीं गया हकीकत में।
और लोग चाहत में खोए से रहते है
हम तो रो पड़ते है चाहत में।
कोई अगर पूंछे तो बता देना उसे
जान जाए जाती है फुरकत में।
दो वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता
क्या रखा है ऐसी मेहनत में।
कब से मशाल-ए-वफ़ा जला रखी है दिल में
अब कुछ पल तो मिले राहत में।
आज एक अजीब सा ख्वाब देखा हमने
कोई जल रहा था हमारी अदावत में।
ग़नीमत में कोई बादशाहत नहीं पाता
बस लानत मिलती है ग़नीमत में।
उसे अपने बेवफाई पर कोई हैरत नहीं
तो हम क्या पा लेंगे हैरत में।
तुम हक़ से कुछ मांगकर तो देखते
हम अपनी जान लिख देते वसीहत में।
By Abhishek Choudhary

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