कुमुदिनी की कहानी: एक बेटी का सफर
By A Bhagya Lakshmi
एक ऐसा समय था जब मैं बेपरवाह थी,
ज़िन्दगी के सारे मज़े लेती थी,
हर पल को जीती थी,
माँ-पापा की लाड़ली थी,
मासूम थी, नटखट थी, बचपन था,
जिद्दी थी और दुनिया के रीति-रिवाज़ों से अनजान थी...
फिर एक ऐसा समय आया जो ना जाने कब
मुझे इतना समझदार बना गया,
कि बचपन मासूमियत सब कहीं खो से गए।
दुनिया के रीति-रिवाज़ों को निभाते-निभाते
ना जाने माँ-पापा की लाड़ली कब बड़ी हो गई,
मानो जैसे नया जन्म लिया हो।
कल तक जो पापा की जिद्दी और बेपरवाह बेटी थी,
आज वह सबका ख्याल रखती है।
कल तक जो पापा की साइकिल पे बैठ के सारा शहर घुमती थी,
आज वह बस के ढ़क्के खा रही है।
अपनी इच्छा से ऊपर घरवालों की इच्छा को महत्व देती है।
हर पल डरती है कहीं ग़लती से कुछ ग़लत न हो जाए,
कोई बुरा न मान जाए...अंजाने में किसी का दिल न दुखे।
जिससे वह बेइम्तिहान प्यार करती है,
कहीं वह रूठ न जाए।
ग़लती ना होते हुए भी ग़लती मानती है,
ताकि वह नाराज़ न हो।
उसका नाराज़ होना मानो जैसे सारी दुनिया ही रूठ गई,
मौसम बेरुखा सा, फूल मुरझाए हुए से लगते हैं।
वह मान जाए इसलिए सारे जतन करती है,
और जब वह मान जाए तो मानो सारी दुनिया उसे मिल गई...
By A Bhagya Lakshmi

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