कुटिया में आदमखोर। - By Yugmahalaya (Sandeep Kumar Singh)
Written By: Yugmahalaya ( Sandeep Kumar Singh)
Category: Poetry.
Competition: Global Poetry and Creative Writing Competition 2026
Yugmahalaya (Sandeep Kumar Singh) presents "कुटिया में आदमखोर।," a poignant piece of poetry submitted to the Global Poetry and Creative Writing Competition 2026. This entry, categorized under Poetry, delves into profound themes of existentialism and spiritual awakening. The work reflects on the human condition and the inner struggles faced by mankind, making it a rich contribution to the competition.
About the Work
"कुटिया में आदमखोर।" is a powerful exploration of life's complexities, presented through evocative imagery and reflective language. The poem grapples with themes of materialism, spiritual decay, and the quest for enlightenment. The mood is introspective, urging readers to confront their inner demons and seek a path towards spiritual renewal. It’s a literary piece that challenges conventional perceptions, encouraging a deeper understanding of the self.
कुटिया में आदमखोर।
Original Submission by Yugmahalaya ( Sandeep Kumar Singh)
कुटिया में आदमखोर।
तो चलो भोर की ओर,
नहीं इस गहन तिमिर का छोर।
मोह में पड़े, प्राण को छोड़,
लगी है, महामृत्यु से होड़ ।
उठे, विप्लव विराट, घनघोर,
क्रुद्ध वनवास, मौन का तोड़।
कोष-कंचन ये कारागार,
न कर पाया जो, आज तू पार,
रहेगा स्वर्ण तेरा शृंगार,
कफन में जेबोँ के अम्बार।
दासता व्यसन,तेरा व्यापार,
नहीं स्वाधीन तेरा संसार।
है जो, जड़ से चेतन लाचार,
वो जीवन, सौ-सौ है धिक्कार।
माँगो, हाँ, माँगो, प्राण-दण्ड ,
है रहा, प्राण का पाप अखंड।
चक्षु, कूप हैं अन्ध, जीभ में बंध ,
कर्ण हैं कुन्द, साँसें प्रतिबंध।
करबद्ध, चरण से तंग,
शीश पर लटक रहे निषंग ।
शिरा में नहीं लहू का रंग,
हृदय जर्जर है, भाव सब भंग।
जीने का लोभ प्रचंड,
मृत्यु को करता है उद्दंड ।
तो मोड़, स्वयं को मोड़,
लगा कुछ जोर,
आज उस ओर,
बहे जिस ठौर,
सूर्य की अविरल धारा।
माँगो, माँगो, वो आग,
नहीं वैराग,
नहीं वो टूटा तारा।
नंगे पाँव ही दौड़,
आग की लीक, मगर, मत छोड़ ,
गिरे सूरज का पारा।
भय और भ्रम के उत्पात,
स्वार्थ के घात, नित्य प्रतिघात,
रहे, नित राज-दण्ड के साथ।
धूल-धूसरित गात, प्रलय के तात,
क्रूर शूलों की शह और मात।
झूमते, दारुण झंझावात,
न आते, राज-दण्ड के हाथ।
हुआ आकाश को पक्षाघात,
धरा को धरे है सन्निपात।
धर वज्र स्वयं के हाथ,
छा जा, बन कर ,उल्का प्रपात
सृजन का पुनः पुनीत प्रभात।
ब्रह्मा का तू अंश,
विष्णु का वंश,
शिव का अपभ्रंश।
मारीचों के मंच,
मंच पर कंस,
वसु, विन्ध्या के विध्वंस।
रावणों के दस-दस स्कंध,
संग सुबाहु और कबंध।
वही मुक्ति, वही हैं द्वंद?
वही प्रतिमा, वही प्रबंध?
पुण्य के माथे पूर्ण- विराम,
पाप के चरण हुए उद्दयाम।
प्रस्फुटित पुष्प नहीं अभिराम,
अंकुरित भेद,दण्ड और दाम।
अवतरित होँगे कब तक राम,
अयोध्या धाम?
विश्व परित्राण,करें निष्काम।
धर्म का चक्र चले अविराम ,
कर्म की गति,अन्तिम परिणाम।
अवतरित कितने होँ घनश्याम?
देव की वृहद वेदना जान,
नहीं विज्ञान,ज्ञान,प्रज्ञान।
ईश की है तू ही पहचान,
विरासत उसकी, तू,संतान।
चरित्र में नही है, उसका ध्यान,
कर्म में, वो है अंतर्धान।
दण्डवत माँग रहा कल्याण,
भीख मे मिलेंगे, क्या भगवान?
मुक्ति का है, तू ही सोपान,
देव ने दिया तुझे वरदान,
तेरे सत्कर्मों में भगवान।
मनुज के सच का , ये संधान。
अनाचार की धार, बनी शृंगार,
मनुज की हार,लिखे तलवार।
रूंड-मुण्डोँ के मुक्ताहार ,
ये बोलो, किसका है प्रतिकार?
द्रवित क्रन्दन ,ये चीख-पुकार,
हठी पीड़ा का हाहाकार,
यही, बस मानव का अधिकार?
न डालो, ईश्वर पर ये भार,
मनुज ने डाल दिये हथियार,
कौन ये चला रहा संसार?
संसार पाप में है डूबा,
धरती का मन भी है ऊबा,
है बनी पिशाचों का सूबा,
मानव होना है, एक अजूबा।
आओ,मानव बाहर आओ,
ऋण से अगाध, न घबराओ।
हो देव-पुत्र, मत भरमाओ ,
सामर्थ्य स्वयं का दिखलाओ,
हाँ, चढ़ो,व्योम पर चढ़ जाओ,
पर, पृथ्वी का कर्ज चुका जाओ。
तोड़ो पैशाचिक द्वार,
करो संहार,
जो उठती विषधर की फुँफकार।
निमन्त्रण न करना स्वीकार,
स्वयं का रहे, अडिग आचार,
यही है मानव का आधार ।
यही पूजा का मूल-विचार।
यही सब अवतारों का सार।
प्रकृति की करुणा का आभार,
नहीं ये दानव का संसार。
तो चलो भोर की ओर,
तमस की अधम साधना छोड़।
स्वार्थ के आतुर दीदे फोड़।
अनभिज्ञ रहे, मुँहजोर,
तेरी कुटिया में आदमखोर।
चेरी है, उसकी कालिमा घोर।
मनुज की संतानों पर जोर,
नहीं,अब, नहीँ चलेगा,और।
चलो, अब लौटा लाओ भोर,
जने वो, मानवता के बौर.
प्रतीक्षरत है ये संसार,
लेगा ईश्वर, अब कब अवतार?
नहीं। अब बहुत हुआ उपकार,
बनो, अब खुद के तारणहार।
मिला ईश्वर से सब उपहार,
न सीमा दानों की।
करो मानवता का शृंगार,
वही है ईश्वर का अवतार,
प्रतिष्ठा प्राणों की।
खोल प्राची के कुण्ठित द्वार,
क्षितिज के मस्तक पर इस बार,
लिखो अनुपम,अतुल्य उद्गार
नहीं, ये दानव की।
ये धरती, मानव की।
About the Competition
The Global Poetry and Creative Writing Competition 2026, hosted by Hashtag Kalakar, celebrates the art of poetry and creative writing from around the world. The competition provides a platform for writers to share their unique voices and perspectives, fostering a global community of literary enthusiasts. It stands as a testament to the power of words in connecting cultures and ideas.
We extend our heartfelt thanks to Yugmahalaya (Sandeep Kumar Singh) for the thought-provoking poem "कुटिया में आदमखोर।" submitted to the Global Poetry and Creative Writing Competition 2026. Your exploration of deep themes and vivid imagery enriches the literary tapestry of the competition. We wish you continued inspiration and success in your creative journey.
About Hashtag Kalakar
Hashtag Kalakar is a creative platform dedicated to providing artists, writers, singers and other creative talents with opportunities to showcase their work and reach wider audiences through competitions, features and creative initiatives.

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