कुछ लब्ज़ कुछ एहसास
Updated: Oct 8, 2022
By Jyoti Saraf
कुछ लब्ज़ कुछ एहसास
आज ये मेरा आसमान मुझसे कुछ ठिठोली सा कर रहा था,
क्या कहुँ इससे जो रात भर बारिशों में भीग सा रहा था।
सुबह होते ही सूरज की किरणों नें इसे ज़रा सुखा सा क्या दिया,
बस छलकते हुए गर्म उजालों ने इसे नहला सा क्या दिया।
अब भी कहीं कहीं छितराए बादल इसे घेर लेना चाहते थे,
वे बेचारे चमचमाते, गड़गड़ाते, उससे मनुहार करना चाहते थे।
अपनी प्रियतमा नदी को मेघों ने टूट कर प्यार किया था,
उनके बरसते नैनों ने हर सावन में इज़हार किया था।
नदी थी की बस उस प्यार के गुरुर में बहते ही चली गयी,
इठलाती बलखाती झूमती , मदहोशी में बिखरती ही चली गयी।
मैं इस खेल को देखने खुले बालों ही छत की ओर दौड़ पड़ी,
उलझे केशुओं में फंसी कंघी ना जाने कहाँ गिर पड़ी।
हवाएँ मदहोश थीं हल्की सी फ़ुहार थी मौसम आशिकाना था ,
प्रियतम ने मेघों के संग संदेश भेजा था, उसमें डूब जाना था।
उन्होनें केवल फुहारें भेजी थीं और मन के तार झंकृत हो उठे,
गगन की असीम विशालता में सुंदर इंद्रधनुषी रंग उभर उठे।
उन प्यारे से रंगों नें मेरे दिल का हर हाल सुना दिया,
मैं शर्माने लगी तो बादलों नें भी लालिमा का वजूद दिखा दिया।
एक जानी पहचानी सी आहट से मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गयीं,
मैं ढूँढने लगी उनको, उनकी उंगलियाँ बालों में कंघी कर गयीं।
By Jyoti Saraf

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