किसी ने कहा
By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain
किसी ने कहा, मन्दिर है टूटा,
किसी ने कहा, मस्जिद है टूटी।
लेकिन मैंने देखा कहीं पर,
इन्सानियत एक कोने में खडी थी,
भग्न हृदया ,चुपचाप लुटी-पुटी।
क्योंकि…………..
इस इन्सानियत के गुंबज ढह गए,
मीनारें टूटी।
मानवता के कलश और दीवारें टूटीं।
समझ में नहीं आता ये मुट्ठी भर लोग,
जिनका न कोई मजहब है न ईमान,
न वे हिन्दु हैं न मुसलमान।
खून के गारे से लाशों की ईंटों पर,
यदि कोई मस्जिद खडी करेंगे
या कोई मंदिर उभारेंगे,
तो उसमें जाकर किस खुदा और
किस भगवान को पुकारेंगें?
उनकी गंदी करतूतों ने गहरे तक,
इन्सानियत को शर्मसार किया है।
जिससे…………
जो अजान कभी सुकून देती थी,
अजब दहशत सी जगाती है।
जो शंख ध्वनि शीतल बयार बहाती थी
वह तन-मन को झकझोर जाती है।
‘धर्म’,‘मजहब’, की दुहाई,
अंत:स्तल को कँपा जाती है, डरा जाती है।
वहशी , दरिंदे,इन्सानियत के दुश्मन,
लाशों का भी सौदा कर लें।
धर्म और ईमान की बातें करते हैं।
सुबह का नाश्ता ,अल्लाह हो अकबर से शुरू,
तो रात का खाना,राम - नाम से खत्म करते है।
शायद जानते नहीं पेट ही गरीबों का मजहब होता है,
यही पेट एक को दूसरे से जोडता है।
रोटी का तो कभी भी कोई धर्म नहीं होता है।
क्योंकि भूखा पेट न अल्लाह को,न राम को,
वह तो रोटी, साग और दाल को ही पुकारता है।
By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain

Comments