किरदार
By Sheikh Wasim Mustafa (Sheikh Sahab 007)
हाल-ए-दिल के देखो,
जज़्बात है कितने
एक ही हुस्न के देखो,
किरदार है कितने
ये शाम दो-गज ,
जमाने से चुराया है मैंने
जरा सी गुस्ताखी के देखो,
पहरे है कितने
ये दावतें मंज़ूर नहीं हमे,
जहां पहरे हों इतने
लाख हसीन हैं यहां,
मगर अच्छे हैं कितने ?
हाल-ए-दिल के देखो,
जज़्बात है कितने
एक ही हुस्न के देखो,
किरदार है कितने ।
By Sheikh Wasim Mustafa (Sheikh Sahab 007)

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