किरदार
By Mayank Joshi
इतना आसान कहाँ है, खुद मे खुद को ज़िंदा रखना,
तोहमत पर भी आज, मुस्कुराना पड़ता है,
दुनिया देखने के लीये, मुझे, माँ की कोख से भी लड़कर आना पड़ता है,
क्या गज़ब का किरदार दिया है खुदा ने मुझको,
मैं भी इन्सान हुँ, हर दफ़ा हर रोज़, ये सब को जताना पड़ता है।
घर आंगन की इज़्ज़त थी, आज ये सब भुल चले है,
माँ_बहेन रिश्ते नही, आज ये कुछ और ही हो चले है,
पल्लू कभी, ज़रा सा जो सरक जाय, तो पेहले अपना दामन बचाना पड़ता है,
गैरों की तो बात कहाँ करू जनाब, अपनो के घर भी आजकल सोच_सोच कर जाना पड़ता है,
आवारगी का एक अजीब सा तमाशा बना दिया गया है मुझको,
की खरीदे मर्द, और वैश्या मुझे कहलाना पड़ता है।
मुझसे ही ये दुनिया आबाद है, आज ये सब को याद दिलाना पडता है,
कहीँ देर हो जाय तो, ना जाने कितनी Comments पर चल कर घर को आना पड़ता है,
सहारा देने कोई नही आयगा, बस यही सोचकर, मेरा लेहजा नर्म करना पड़ता है,
आनेवाला कल शायद, मेरा बेहतर होगा,
खुद को ज़िंदा रखने के लीये कभी कभी ये झुठा दिलासा देना पड़ता है,
इतना आसान कहाँ है, खुद मे खुद को ज़िंदा रखना,
तोहमत पर भी आज, झुठा ही सही मगर मुस्कुराना पड़ता है।
By Mayank Joshi

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