किनारे लग भी गये
By Usaid Shaikh
किनारे लग भी गये क़ाफिले सराबों के बिखर बिखर भी गये सब वरक़ किताबों के ना जाने मुझ को कहां ले चली हैं बरसातें धुवां धुवां हैं सभी सिलसिले सितारों के
तो क्या फरार भी खुद से; तलाश है खुद की
के अजनबी ना लगे ख्वाब कुछ बहारों के
कोई रुके ना रुके देखने खिज़ाओं को
कोई सुने ना सुने गीत आब्शारों के
कभी सिमट ना सकी रात टूट जाने की
कभी अदा ना हुवे मुझ से हक़ सहारों के
सराब =
वह रेत जो गर्मियों में दूर से पानी की तरह चमकता हुआ दिखाई पड़ता है और प्यासे उसे पानी समझकर उसकी ओर दौड़ते हैं
(लाक्षणिक) धोखा देनेवाली चीज़ या बात, मृगतृष्णा, भ्रम, मिराज, मरीचिका
खिज़ां = पतझड़
आबशार = झरना
By Usaid Shaikh

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