किताब अधूरी
By Bhavya Barai
हम भी उस किताब की तरह हैं,
जिसे समझ न आए तो लोग आसानी से छोड़ देते हैं,
और जो समझ ले… वो भी सिर्फ अपने पसंदीदा पन्ने ही पढ़ते रहते हैं।
पूरा कौन पढ़ता है आजकल?
लोगों को कहानी चाहिए होती है… इंसान नहीं।
आज तक न कोई ठहरा हमारे सारे सफ़हे पलटने को,
शुरुआत पसंद आई सबको,
मगर गहराई तक पहुँचने का हौसला किसी ने रखा ही नहीं।
इसलिए दिल अब समझाए जाने से थक चुका है…
उम्मीद भी अब बोलती नहीं,
बस कहीं चुपचाप बची हुई है,
जैसे आख़िरी सफ़हे पर टिकी हुई एक ख़ाली बिंदी।
By Bhavya Barai

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