किताब
By Akansha Ashok
तुम इंसानों को इंसानों की तरह देखते हो।
और मैं उन्हें किताबों की तरह।
मशगूल सी सड़कों पर जब हज़ार लोग दिखते हैं,
तो मैं उनकी सूरत देखने की जगह उनकी आँखों में झाँकने की कोशिश करती हूँ।
हज़ार चेहरे हज़ार कहानियाँ बयाँ करते हैं।
हज़ार कहानियाँ, कई किरदारों से मिलवाती हैं।
कई किरदार, छुपे हुए ज़ख्म की निशानी बयाँ करते हैं।
फ़र्क बस इतना है कि तुम उस सच से वाक़िफ़ नहीं हो जिसे मैं हूँ।
तुम उन कहानियों के हिस्सेदार नहीं हो जिससे मैं रू-ब-रू हूँ।
औरों की कहानियाँ पढ़ने की चाह में जब मैं खुद में झाँकती हूँ,
तो मैं एक बात भूल जाती हूँ कि
मुझे एक अपनी भी कहानी लिखनी है
जो मैं अक्सर लिखते-लिखते लिख नहीं पाती हूँ।
By Akansha Ashok

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