किताब
By Vishvadeep Jain
लिखता हु की
कहानियों और किस्सों को पन्नो पर उतारते जा रहा हु ,
ना जाने किसके लिए मैं यूं इतना लिखता जा रहा हूं ,
ना पढ़ने वाला कोई है ना ही लिखने वाला हैं कोई ,
मैं यूं ही अपनी स्याही को कागजों पर मलता जा रहा हु ,
इस सोच मैं की आएगा एक दिन की कोई पढ़ेगा इन पन्नो को ,
समझेगा जज्बातों को और समझेगा इन लिखी हुई बातों का ,
आएगा एक दौर जब मेरी किताब भी पढ़ी जाएगी ,
सुनने की बजाय वो कही लोगो के बीच सुनाई जाएगी ,
बस उसी पल के इंतजार में मैं यूं ही लिखता चला जा रहा हु ,
अपनी सोच और औरों की बातों को मैं कागजों पर संजोता जा रहा हु ,
बना कर एक किताब मैं उसे यू ही रख कर चला जाऊंगा ,
जिसे पढ़ने हो जज्बात या लिखना हो कुछ ,
कुछ खाली पन्ने उसमे यूं ही छोड़ आऊंगा ,
बस इंतजार उसी दिन का करूंगा की आएगा एक वक्त
जब मेरी किताब भी पढ़ी जाएगी ,
उसके अंदर की बातें जब सबको सुनाई जाएगी ,
और गर्व मुझे उस दिन इस बात पर होगा की
लिख रहा था मैं पन्नो पर जिस समय सब वक्त रील्स पर बिता रहे थे ,
और जब बातें मैसेज से हुआ करती थी मैं उस वक्त पन्ने किताब के भरते जा रहा था ।।
By Vishvadeep Jain

Words written very nicely ...
Woowwwww 😍😍🤌🏻
Portrayed very well..
♥️♥️