कितने रंग हैं तेरे मेरे
By Niharika Singh Parmar
कितने रंग हैं तेरे मेरे
थोड़े फीके थोड़े गहरे
कभी बने अनबुझ पहेली
कभी हैं पहचाने चेहरे
कुछ रंगों को जाना मैंने
तेरे प्यार के तेरे साथ के
लम्हे कम पड़ जाते जिनमें
अपनेपन से भरी रात के
तेरी आवाज तेरा एहसास
चारों ओर से मुझको घेरे
कभी बने अनबुझ पहेली
कभी हैं पहचाने चेहरे
कुछ रंग क्यों राज बने हैं
देखूं उनको भी पहचानूं
गठ बंधन का इंतजार है
शायद उनको तब ही जानूं
चाहा तुमको खुद से ज्यादा
साथ तुम्हारे लेने हैं फेरे
कभी बने अनबुझ पहेली
कभी हैं पहचाने चेहरे
By Niharika Singh Parmar

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