कितने अलग !
By Mayank Srivastava
कभी किताब सा पढूं तुम्हे
अल्फ़ाज़ों में गढूं तुम्हे,
तुम तो मृग कस्तूरी हो
साँसों में थोड़ा भरूँ तुम्हे |
तुम हो जैसे हो कुंदन
हो मेरी पूजा का तुम वंदन,
मेरे जीवन का इंद्रधनुष हो
फीके रंगों में भरूँ तुम्हे |
उजली-उजली भोर हो तुम
मेरे अनंत का चोर हो तुम,
तुम तो मानकों की माला हो
लेकर जिसको जपूँ तुम्हे |
तुम किसी बाग़ का ब्रह्मकमल
मैं खुद में जलती दावानल,
तुम अप्राप्य शीतल चन्दन हो
नित-नित माथे धरूँ तुम्हे ||
By Mayank Srivastava

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