कितना आसान है ना
By Shivangi Kaushik
कितना आसान है,
रोज रात को रोकर सोना लेकिन सुबह मुस्कुराकर जागना ।
कितना आसान है,
रोज हारकर कल फिर जीतने के लिए उठना ।
कितना आसान है,
हर दिन लोगों की नफ़रत, उनके तानो का सामना करना।
कितना आसान है,
अंदर उठ रहे दर्द के हर तूफान को दबाकर चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट ओढ लेना ।
कितना आसान है,
हर दिन खुद से लड़ना, उलझना, अपनों को खोना, दर्द को सहना, जिदंगी जीना।
सच ही है बहुत आसान है,खुद से खुश रहना।
By Shivangi Kaushik

Comments