काश ये ज़िंदगी
By Monica Singh
काश ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती
परेशनियाँ बस चंद दिनों की मेहमान होती
ऑफ़िस की वो अप्सरा
उसकी नहीं
मेरी जान होती
और सैलरी को फ़ोन कर
जब चाहे बुला लेता
काश वो भी कोई नरमदिल इंसान होती
और मेरे सारे फ़ैसलों पर
मेरी ही कमान होती
जो थोड़ा पैसा आ जाता
तो मेरी भी कुछ शान होती
जो लैंड्लेडी चिल्लाती है
वो भी मुझपर महरबान होती
काश ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती
काश ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती
जो समय पर घर आता
तो थोड़ी कम थकान होती
फिर साँझ ढल जाने पर
कोई ख़ास मेरे यहाँ भी मेहमान होती
फिर उसकी और मेरी एक ही ज़ुबान होती
उसे मेरे कीर्तन और मुझे पसंद उसकी आज़ान होती
और फिर शादी को लेकर माँ भी कुछ कम परेशान होती
काश ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती
काश ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती
और क़िस्मत कुछ इस क़दर कदारदान होती
के जिसके छोटे से फ़्लैट में रहता हूँ
वो सारी बिल्डिंग ही मेरा मकान होती
और मकान से याद आया
काश ई एम आइ भी माफ़ होती
बैंक की वो शाखा मुझपर इतनी महरबान होती
एक ट्रिप पेरिस और दूसरा अंडमान होती
अगर मेरे यहाँ भी लक्ष्मी विराजमान होती
इनमे से कुछ सपनों की उड़ान मैं भी तय करलेता
जो ज़रा मेहनत करता और दुनिया थोड़ी कम बे ईमान होती
तो फिर ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती
काश ये ज़िंदगी थोड़ी और आसान होती।
By Monica Singh

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