कहूँ कि नहीं
By Jagrati Chaurasiya
कहूँ तो बहुत कुछ हैं।
और न कहूँ तो शायद कुछ भी नहीं।
यू तो ख़ामोशी चारों ओर बिखर रही।
और ताले जब तक लबों पर शायद तब ही चुप्पी रही।
देखते-देखते ये सिलसिला बढ़ता जा रहा।
लफ़्ज़ों को ज़ुबाँ का ज़ायक़ा चखे इक अरसा हो रहा।
कब तक इस फ़रमान को दिल मानता रहेगा।
आख़िर कब तक दिल मौन रह पायेगा।
इस दुनिया के फ़लसफ़े से तो कोई शिकवा नहीं हमें।
हम तो ख़ुद में इतना मशरूफ हैं इसकी कोई ख़बर कहां हमें।
पर कभी न कभी तो जी चाहता ही हैं।
कि न रखूँ भीतर सब बयां कर ही दूं।
कुछ को चुभेंगी, कुछ के रूखसार पर मुस्कुराहट होगी।
आख़िर हर किसी के हृदय में ज़ज़्बातों की भांति-भांति की लिखावट होगी।
हर दफ़ा बस यही
सोचती हूँ कि कहूँ कि नहीं।
पर आख़िर कब तक ज़बाँ पर मौन का पर्दा डाला जा सकता हैं।
कितना भी बांध बना लो विचारों के समंदर को थोड़े ही रोका जा सकता हैं।
By Jagrati Chaurasiya

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