कहां जाना है?!
By Saksham Raj
ये कैसा दौर क्या ज़माना है?
बड़ा ही तुर्फ़ा सा फ़साना है
शमा बुझ जाया करती है
और मज़े में बैठा परवाना है
एक वहशत है मन में कहीं
दिल मेरा नहीं अब बेगाना है
मुस्तक़बिल ज़िंदगी का मालूम नहीं
बस यूं ही चलते चले जाना है
वो दोस्त बनना तक भूल चुका है
मुझे फ़िर भी रिश्ता निभाना है
एहसान हैं उसके कई मुझ पर
अभी तो उन्हें भी चुकाना है
उसका मिलना अब मुमकिन नहीं
फ़िराक़-ए-इश्क़ भी पैमाना है
बेरुखी से जिया करता हूं 'क़ाबिल'
अब किसी से क्या छुपाना है?
By Saksham Raj

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