कहते हैं लोग
By Manu Singh
कहते हैं लोग
कि अपने अंदर के बच्चे को ज़िंदा रखो
मगर वहीं अपनी शर्तों के भार से
उसका दम घोटने लगते हैं
बच्चा लड़ता है
तड़पता है
खुल के खेलना चाहता है
खिलखिलाना चाहता है
निडर, अपने रूप में रहना चाहता है
मगर ज़बरन दुनिया के रंग में रंगता जाता है
अपने आप को खोता जाता है
भार बढ़ता जाता है
अनसुनी चीखें, लम्बी सिसकियाँ बन जाती हैं
खेलने का आँगन कम हो जाता है
दम घुटता जाता है
कि बस
बच्चा, बच्चा ना रह पाता है
फिर कहते हैं लोग
कि अपने अंदर के बच्चे को मरने ना दो।
By Manu Singh

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