कल की यह बात है
By Laxmi Guria
चेहरे से तेरे दीदार था मेरा,
किसे पता था इतनी जल्द आएगा सवेरा,
नीला था पहनावा तुम्हारा,
लाल हो गया यह मुखड़ा भी बेचारा,
न जाने किस राज़ की बात है यह अनसुनी ,
क्या इस राह में हमसे टकराना चाह थी तुम्हारी?
इन पर्दों के बिना दिखती नहीं हमे यह ज़िन्दगी,
किस किताब के कीड़े हो तुम ?
खुली किताब को न पढ़ पाए तुम हमारी!
चलते-ठहरते, छुपते-छुपाई,
आँखें नज़रों से मिल ही जाये यूँही.
क्या याद है तुम्हे,
सफर उस रात की ?
दो पहियों में सवार हम ,
दो घंटों की बात रह गयी हमारी, चुप्पी की |
सुना है तेरे नए इश्क़ के चर्चे हज़ार ,
सुना है तेरे नए मसलों के मोल हर बाजार |
किस वक्त का इंतज़ार है तुम्हे ?
बेवक्त है यह मोहब्बत तेरी – मेरी |
और अगर मैं किनारा तेरे बिना,
जा सनम, तू भी न सवेरा मैं जहाँ!
By Laxmi Guria

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