कल आज कल
Updated: Feb 12, 2024
By Anubha Singh Jain
हर दिन एक सा नहीं होता,
पेड़ का हर पत्ता समान नहीं होता,
हर शख्स आम नहीं होता,
हर लम्हा खास नहीं होता,
जिस धड़कन पर ठहर जाए ये मन,
वही साज़ बेनाम नहीं होता।
खुद गिर कर सम्भल जाती हूँ,
अपनी ही गलतियों पर मुस्कुराती हूँ,
आज भी नए रास्तों पर लड़खड़ाती हूँ,
आप बीती बस माँ को ही सुनाती हूँ,
दुनिया से मिली बेरूखी को, खुद में ही दबाती हूँ,
दोस्ती ना टूट जाए, इसलिए दोस्त से भी छुपाती हूँ,
कि उसका बेगानापन बुरा लगा था मुझे उस रोज़,
गीले तकिये की सिलवटें खुद ही सरहाती हूँ,
अपनी उम्मीद का दीया हर उस पल जलाती हूँ,
जब कोई ना हो देखने वाला, तब खुद को समझाती हूँ,
जीवन की अटकेलियों को खुद ही सुलझाती हूँ,
हाँ, मैं खुद से मुहब्बत करती हूँ।
क्या होता जो आज जैसा कुछ ना होता,
क्या होता जो कल का शोक, ना कल का इंतजार होता,
क्या होता जो मुकम्मल हर ख्वाब होता,
क्या होता जो करार-ए-दिल बदनाम ना होता,
जिसे गुनगुना रही मैं हर पहर,
वही नज़्म कामिल नहीं होता।
By Anubha Singh Jain

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