कयामत
By Vikas Kumar
तजदीद ए वफ़ा ए आस ए शुआए अब भी बाकी है।
पर ये आस ए शुआए इस जिस्त ए दौर में नाकाफी है।
शब ए वस्ल ए खुशबू इन फिजाओं में अब भी महके है।
पर वस्ल ए खुशबू से हयात बस तसव्वुरात में हीं बहके है।
ना तो निखर रहा इबादत ए नमाज मानिंद ये हयात।
ना हीं बिखर रहा गो वहशी ए मजाज़ मानिंद ये हयात।
विसाल ए यार की चाह में जब सुलगता है जज़्बात ए हयात।
फिर दौर ए मयकशी में पाता हूं तुम्हारा दौर ए तसव्वुरात।
दौर ए तसव्वुरात में कुछ इस कदर है खोता है ये बावरा मन।
गो मेरे सुलगते लबों पर तेरे शबनमी लबों के साए हो हरदम।
तेरी ये नाजुक ए मरमरी पैकर मेरे बाहों में कुछ इस कदर है सिमटी।
गो दरख़्त ए चंदन से बलखाती नागिन कई जन्मों बाद हो लिपटी।
एक दूजे के जिस्मों का अतिक्रमण इस क़दर कर रहे परिरंभ पाश में।
चेतना से परे समाधि में निस्पंद हो गए हो शब ए वस्ल ए मधुमास में।
ये शब ए वस्ल, कयामत तक शुआए सहर से रहे सलामत।
दिल ए नादान की चाहत है दहर में कभी आए हीं ना कयामत।
ये जिस्त बस दौर ए मयकशी से आलम ए बेहोशी तक ही रहते तसव्वुरात के जद में।
फिर रूबरू ए हकीकत होता दिल और सुलगते है जज़्बात आलम ए हिज्र ए वहशत में ।
हर नफ़स बेजार, सांसे गिराबार लगती है इस जिस्त ए तन्हाई में।
फिर शिव तांडव से ज्यादा वहशत पलती है इस रूह की पहनाई में।
अब तसव्वुरात में लगाता हूं आग इस रंगी जमाने में।
इसके हर एक शय में इसके हर एक झूठे फसाने में।
लो मान लिया कि हिज्र की रातों ने दिखाई थी मुझे ये दिशा।
पर दिल पर खुदी से हीं खींचा है मैंने ये सतवत के निशां।
By Vikas Kumar

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