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कमरे का नाम "काश"।

Aug 14, 2025
2 min read

By Aqdas Mujtaba Gulam Tajuddin


आज लौटा हूँ वहाँ जहाँ से सब शुरू हुआ था


ये कमरे की दीवारें ऐसी हैं, जैसे कोई अपना मुझे गले से लगाता हो


मेरी हँसी, रोने की हिचकियाँ, या मेरी खामोशियाँ


दर-ओ-दीवार इन सब से वाक़िफ़ हैं


कितने क़िस्से कितनी कहानियाँ,


वो खिड़की से देखता रहता था चाँद मुझे इस मेज़ पे बैठे हुए,


कुछ लिखता रहता था,


वो एहसास अब भी ज़िंदा है बस कहीं खोया है


किसी की ख़ुशबू अब भी इस कमरे में क़ैद है


वो किताबों के उड़ते पन्ने, ये सिलवटें बिस्तर की, वो घड़ी की टक टक, मेरी धड़कन सी चलती, सब ठहरा है अब भी वैसे ही


जैसे वक़्त ख़ुद रुक गया हो इस कमरे में


मेज़ के एक खाने में एक ख़त रखा रहता है, जैसे पंख कटा परिंदा पिंजरे में क़ैद हो


जो उसकी मंज़िल को कभी पहुँच ही न सका


लाचार मजबूर, उम्मीद पे ज़िंदा


उन अल्फ़ाज़ के मानी अधूरे हैं अब भी, वो मिले ही नहीं उसे जो पूरा करे उनको


क्या जला दूँ इस ख़त को?


वो अल्फ़ाज़ बहुत रोएँगे, वो स्याही बहुत तड़पेगी,


वो आईना जिसने देखा मुझे रोज़ मुस्कुराता, पूछ रहा है कि क्या हो गया?


तू बदला सा नज़र आता है, ये अदाकारी कहाँ से सीखी है, मैं तो सब को सच दिखाता हूँ, क्यों तेरा चेहरा नहीं पढ़ा जाता है?


इतने सवालों का उसे जवाब क्या दूँ


उसे क्या ख़बर कि फ़ितरत उसकी मेरे दिल ने अपना ली


छूटा किसी के हाथ से और टूट के यूँ बिखर गया कि अब जुड़ नहीं सकता


या मेरी ही ग़लती से टूटा था, क्या मेरे ही हाथ से छूटा था?


कितनी बातें दिल के संदूक़ में बंद करके चाबी कहीं फेंक दी थी


काश उसपे ताला न लगाया होता


तो ये कमरा यूँ सूना न होता


ये वक़्त ऐसे रुकता ही नहीं,


वो शीशा कभी टूटता ही नहीं


वो अल्फ़ाज़ बेमानी न रहते


वो परिंदा पिंजरे में क़ैद न रहता


अब ज़िंदगी इस कमरे के चक्कर लगाती है


कमरे का नाम "काश" है.


By Aqdas Mujtaba Gulam Tajuddin


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20251093
Dec 04, 2025
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Bohot khoobsurati se alfaaz likhe hai..

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