क़ौम-परस्ती
Updated: Jul 18, 2025
By Kshitij Kawatra
क़ौम-परस्ती का तमाशा लगा है
आज कितनो का जनाज़ा लगा है
रहबर फिर से कहीं बिल में छुपे हैं
बे-घर मा’सूमियत का ताँता लगा है
माना लड़ाई दो-तरफ़ा है
पर एक तरफ़ झटका ज़्यादा लगा है
अब किसे बुरा किसे भला कहें
सब की ‘अक़्ल पे जो ताला लगा है
ख़ूब बसाया था जो शहर तुमने
क़ब्रिस्तान में जैसे मेला लगा है
ज़मीन की लड़ाई ज़मीन पर हो
आसमान में देखने का सिलसिला लगा है
जिस ख़ुदा के नाम पर क़त्ल हुए हैं
उस ख़ुदा पर अम्न का धब्बा लगा है
रोके तो कौन इस क़त्ल-ए-’आम को
हुकूमत को जफ़ा का चस्का लगा है
कहते हैं नफ़रत सोच के कीजिएगा
कल जिससे थे ख़फ़ा वहाँ आइना लगा है
By Kshitij Kawatra

Comments