कौन हो तुम?
By Sneha Dhuppe
मोहित कर दे जिसकी खुशबू, पारिजात की शाख हो तुम
जलते हुए कोयले से निकले, सुलगती हुई राख हो तुम
मंत्रमुग्ध जो करदे मन को, बांसुरी की वो तान हो तुम
कोयल की वाणी में डोले, खुश दिल वाला गान हो तुम
ग्रीष्म से तपती गर्म जमीं पर, गर्द पेड़ की छांव हो तुम
मझधार में गोते खाके भी, जो पार करे वो नांव हो तुम
शीतल गहरे चांद में छिपती, पिघली हुई सी रात हो तुम
उलझे से दिल को सुलझा दे, ऐसी मीठी सी बात हो तुम
गहने पहने बिना जो चमके, अल्हड़ सी मुस्कान हो तुम
बेफिक्रे से मन को बांधे, ऐसे दिल का रुझान हो तुम
निर्जल की जो प्यास बुझाए, अमृत का एक जाम हो तुम
खास हो तुम ये हम बतलाए, फिर भी कहती आम हो तुम
By Sneha Dhuppe

Beautifully written