कौन कौन सी आजादी
By Anirudh Rana
"भैया, बस निकली तो नहीं ना अभी?" सतीश ने सामान गाडी से उतारते हुए पूछा।
"नहीं साहब, अभी तो आने में वक़्त है थोड़ा।" चाय वाले ने एक राही को चाय का ग्लास पकड़ाते हुए जवाब दिया।
पूरे दो साल बाद रमेश की छुट्टियां मंज़ूर हुई थी। सीमा पर हालात पिछले दो सालों से संवेदनशील थे। कंपनी कमांडर को भी ऊपर से सख्त निर्देश थे कि किसी की भी छुट्टियां मंज़ूर न की जाएँ। धीरे धीरे हालात सामान्य होने लगे तो छुट्टियां भी मंज़ूर होने लगी थीं। रात भर गश्त करके लौटा रमेश थका हुआ तो बहुत था, पर घर जाने की उत्सुकता उसके चेहरे और बातों में झलक रही थी। मुख्य सड़क बेस से 15 मील दूर होने और वहां तक जाने वाले रास्ते की अवस्था को ध्यान में रखते हुए, सतीश ने अपने साथी रमेश को मुख्य सड़क तक गाड़ी से छोड़ना बेहतर समझा ताकि बस समय से मिल जाए। नहीं तो फिर अगले दिन का इंतज़ार करना पड़ता।
"स्वतंत्रता समारोह तक तो आ ही जाओगे ? आज़ादी की 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं इस बार। सुना है समारोह भी बड़े स्तर पर होगा।" सतीश ने सड़क पर बस को ताकते हुए कहा ।
"हाँ, उससे ज़्यादा छुट्टिया मंज़ूर भी नहीं हुई हैं। फिर समारोह की तैयारियां भी करनी हैं मिल कर" रमेश ने हँसते हुए जवाब दिया।
"इस बार अपना ज़मीन का मुद्दा भी सुलझा ही लेना, रमेश। कब तक चक्कर काटोगे बाबुओं के।"
"इस बार तो सुलझ ही जाएगा। कागज़ात तो पूरे हैं मेरे पास। थोड़ी सी औपचारिकता शेष थी, उसके लिए कुछ रकम ले ही जा रहा हूँ। बाबू से बात भी कर ली है छोटे भाई ने। तुम्हारे पैसे भी जल्द ही लौटा दूंगा सतीश।"
"कोई बात नहीं। जब हो सके तब दे देना, पर इस मामले को सुलझा ही देना इस बार । मैंने तो पहले ही कहा था कि सीधे बाबू से बात कर लो। समय भी बचता और यूँ चक्कर न काटने पड़ते कार्यालय के।"
"मुझे क्या मालूम था कि ऐसा होगा। मुझे लगा जैसे हम ईमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं सीमा पर, वैसे ही सब करते होंगे। फिर मेरे तो कागज़ात भी पूरे थे। बस 'मिठाई' ही नहीं खिलाई थी बाबू को।"
"ऐसा ही चलता है मेरे भाई। समाज में हर तरह के लोग हैं। साल भर में कुछ दिन की छुट्टियां मिलती हैं तो किसके पास समय है कि क़ानून बाजी करे। तब चाहिए कि जल्दी से काम हो जाए बस।"
इतने में बस हॉर्न बजाते हुए पहुंच गयी। सतीश से गले मिल कर रमेश बस में चढ़ गया। सतीश ने भी सामान कंडक्टर की मदद से बस में रखवा दिया और बस को तब तक देखता रहा जब तक वह अगले मोड़ पर उसकी आँखों से ओझल ना हो गयी ।
सतीश वापिस जाने को गाड़ी में बैठा ही था कि चाय वाले ने मासूमियत से पूछा, "साहब, मेरा भी एक प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है बहुत समय से। मैं भी 'मिठाई' खिला कर देखूं क्या बाबू को ?"
सतीश ने हँसते जवाब दिया, "कोशिश करके देख लो।"
"इस स्वतंत्रता समारोह कोशिश करना साहब, कि इस बार 'मिठाई' की परंपरा से भी आज़ादी मिल जाए हमें।"
सतीश के पास चाय वाले की इस बात का कोई जवाब नहीं था। वह उसे देख कर बस मुस्कुरा दिया और चल पड़ा वापिस बेस की ओर यह सोचते हुए कि जाने कौन कौन सी आज़ादी लेनी बाकी हैं अभी ।
By Anirudh Rana

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