औरतों का इतवार
By Disha Kedia Gupta
“औरतों की ज़िंदगी में ,इतवार नही होता.
कहे उनसे कोई, आज छुट्टी है तो उसे एतबार नही होता.
ये मैंने ही लिखा था.
पर लगता है बात कुछ अधूरी रह गई.
इनकी ज़िंदगी में इतवार भी होता है और छुट्टियाँ भी.
पर सिर्फ़ तब तक ही जब तक ये किसी की बहन और बेटी होती है.
बेशक ये इतवार ये छुट्टियाँ कुछ शर्तों के साथ होती है .
जैसे गाय के बछड़े को बांध दिया जाता है,
एक खूँटे से ,लम्बी सी रस्सी के साथ.
वह घूम फिर सकता है उसी दायरे में.
ठीक वैसे ही ये बहन बेटियाँ भी.
अकेले बाहर मत जाना.
किसी लड़के से मत मिलना,
साँझ होते होते घर आ जाना वग़ैरा.
चलो फिर भी जी लेती हैं.
कर लेती है आधा अधूरा अपने मन क.
पर!
जैसे ही किसी की पत्नी, किसी घर की बहू बनी.
सारी छुट्टियाँ निरस्त!
सप्ताह से”इतवार” नदारद.
उस पर भी ताने उलाहने,
सारा दिन करती क्या हो.
एक नज़र एक आम स्त्री की ज़िंदगी पर.
सुधा मेरी फ़ाइल टेबल पर नही है कहाँ गई?
माँ स्कूल का टाइम हो गया एक मोज़ा नही है?
मुझे बस स्टॉप पर छोड़ आओ, देर हो रही है ममी!
सुधा चाय देना बेटा,
सुधा आज पैरों में बहुत दर्द है मालिश वाली को फ़ोन कर देना.
ये सारी आवाज़ें हम सभी के घर में प्रतिदिन सुबह सुबह सुनाई देती है.
काम अलग अलग होते है पर करने वाली बस एक ही है.
हाउस वाइफ़ अर्थात्,
किसी की पत्नी,
किसी की मॉ,
किसी की भाभी या बहू.
और जिसका काम न हो वह बस ग़ुस्से में एक ही बात कहता है,
सारा दिन घर पर रहती हो ,ये भी नही कर सकती!
आख़िर सारा दिन करती क्या हो?
वास्तव में ये यक्ष प्रश्न है, सारा दिन ये औरत करती क्या है?
चलिये आज हम देखते है कि ये करती क्या है.
सुबह पाँच बजे जब सब सो रहे होते है वह उठ कर पानी आया या नही,
चला न जाये ,भरकर रखती है.
फिर दूध वाले का इंतज़ार करते करते टिफ़िन बनाने में लग जाती है.
तभी सब के लिये चाय बना बेड टी देती है.
स्कूल जाने वाले बच्चों को उठा कर तैयार करती है.
पति को ऑफ़िस भेजती है, सबको टिफ़िन भी देती है.
फिर एक कप चाय पी काम में लग जाती है.
रसोई के ढेरों काम,
कपड़े,
सफ़ाई
घर का राशन लाना या मंगवाना,
बिजली का बिल जमा करवाना,
गैस बुक कराना,
रिश्तेदारी में आना जाना निभाना,
सास और ससुर के डॉक्टर से बात कर उन्हें दिखाकर लाना,
बच्चों की पढ़ाई का ध्यान रखना,
उन्हें बस पर छोड़ कर आना, वापस लाना,
ढेर सारे काम.
दूध उबालते उबालते आटा लगाना.,
वॉशिंग मशीन में कपड़े डाल सब्ज़ी चढ़ाना.
आज कल multi tasker हो गई है.
जो काम घर में पहले पुरुष करते थे,
उनके वो काम भी ये हाउस वाइफ़ ही करती है.
अपने आप को भूल जाती है.
अपने सपनों को, हसरतों को चूल्हे की राख संग उड़ा देती है.
अपने ख़्वाबों पर धूल चढ़ा घर की गर्द साफ़ करती है.
रद्दी वाले को पुराने अख़बारों के साथ अपनी शिकायतें भी दे देती है.
अपने पंख काट कर सबको उड़ना सिखाती हेर.
थका तन हर रात हड़ताल पर जाना चाहता है.
पर ज़रूरतें और मजबूरियाँ सुबह होते ही काम पर लगा देती है उसे.
और जब किसी का एक भी काम न हो,
यही सुनती है,
सारा दिन घर पर रहती हो!
"आख़िर करती क्या हो"?
चलते चलते
घोसला बनाने में यूँ मशगूल हो गये
उड़ने को पंख है, हम ये भी भूल गये!!!
ये तो “हाउस वाइफ़” की ज़िंदगी है.
कामकाजी औरतों के हालात तो और भी बदतर है.
घर बाहर की दोहरी मार.
उस पर,
आज तो तुम्हारी छुट्टी है कह कर ढेरों काम सौंप दिए जाते है.
उपर से ऐसा लगता जैसे काम क़ाज़ी दफ़्तर से कोई पिकनिक कर के आती हो.
आख़िर ऐसा क्यों है!
वक़्त के साथ जब सब कुछ बदल रहा है औरतों के लिए नज़रिया क्यूँ नही बदलता.
क्यूँ उन्हें ख़ामोश रह गुज़ार देनी होती हाई ज़िंदगी.
क्यूँ उनकी दिनचर्या सुबह दूध लेने से लेकर रात को दही जमाने पर सिमट जाती है.
By Disha Kedia Gupta

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