ऐसा जहां
By Manu Singh
आओं
चलते हैं ऐसे जहां में,
जहाँ, ना कोई आपको जानता हो
ना हमको
गुमशुदा, मगर खुद के और क़रीब
जहाँ बेनक़ाब चेहरे हों
दिल के भाव गहरे हों
जहाँ एक दूसरे को पीछा छोड़ने की दौड़ ना हो,
नीचा दिखाने की होड़ ना हो
जहाँ पेड़ों से बातें कर जाएँ
बिन भाषा पक्षी समझाएँ
जहाँ ज़िंदगी ज़िंदा हो
हर एक सांस का अपना मज़ा हो
जहाँ सुबह देखने की ललक हो
और रात की अपनी ही चमक हो
जहाँ ना कोई अति हो,
ना कोई कमी हो
जहाँ ना कोई अपना हो
ना कोई पराया हो
आओ, चलते हैं ऐसे जहां में।
By Manu Singh

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