ऐतबारी!
By Prathamesh Samant
राह चलता रही चला इतनी दूर,
राह भी यूं परेशान हुई...
चार कदम और चली,
फिर यका-यक थमसी गयी...
साहिल डूबा दरिया में इतना गहरा,
दरिया भी यूं हेरान हुआ...
आमीकीजरासी और नापी,
फिर बूँद-बूँद बिखर सी गयी...
बरसातें जमकर बरसी इतनी पुर-जोश,
अंबर को भी यूं करामात हुई...
घिर के आई वोह बदरी ऐसी,
फिर कतरा-कतरा गल सी गयी...
सितारें रोशन हुए इतने शोख,
शब् को भी यूं हेरत हुई...
थोड़ी कजराई और सियाही,
फिर सेहर में कहीं खो सी गयी...
दुनिया की ये ऐयारी इतनी संगदिल,
ज़मीर को यूं तकलीफ हुई...
थोड़ी और दिल ने की ऐतबारी,
फिर जिंदगी रूठ सी गयी...
By Prathamesh Samant

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