ऐ क़लम
By Chandra Kant Mishra
लेखनी नहीं हथियार है तू मज़लूम-ए-दिल का तलबगार है तू टूटती है ज़ालिमों पर शमशीर बन के रुख़-ए-रौशन की तदबीर बन के क्रांति की मशाल है तू बहादुरी की मिसाल है तू दलित,शोषित स्वर की हुंकार तुझमें
सीमा पर अड़े सपूतों की पुकार तुझमें सभ्यता-संस्कृति की जान तुझसे पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ी है ज्ञान तुझसे काट लें सर किसी का भले तलवार से मुक्त कैसे हो समाज उसके नीच विचार से उन विचारों की धारा तुम सुधारती इसलिए नमन तुम्हें करे माँ भारती गाथा तेरे यश की विशाल है ऐ कलम तू बेमिसाल है।
By Chandra Kant Mishra

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