ऐ जिन्दगी
By Pratibha
रातों की नींद की आदत तो हमें थी ही कहां , क्यों दिन का चैन चुराए फिरती हो,
ऐ जिन्दगी क्यों राहतों की छवि दिखाकर टुकड़ा टुकड़ा जलाया करती हो,
कहां मिलती है आसानी से मंजिले , सफर में ही हराए फिरती हो,
रोक लेता गर मैं एक भी लम्हे को,
तो वक़्त को भगाया करती हो,
खुद का मान लेने से कौन किस का होता है, क्यों भ्रम में उम्र कटवाए फिरती हो,
आशियां तो बसता है सपनों में,
जिंदा तो तू लाश बनाए फिरती हो,
क्यों ए जिन्दगी , खुशियों का वादा कर के आँसुओं में ही जाया करती हो ।
By Pratibha

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