एहसास
Updated: Sep 3, 2025
By Anal Kishore Singh
अनंत सागर में विलुप्त कहीं
था उसका अस्तित्व वहीं
एक दफा छू कर जज्बातों को
हजारों फासलों से भी दूर कहीं
किसी अधूरी याद की तरह
ज़हन से हृदय तक, स्मरण से विस्मरण तक
था वजूद किसी अधुरे ख्वाब की तरह
अस्थायी इस सागर में, ढूंढते खुद खो गया मैं
कौन हूं मैं और क्या हूं मैं
उसके बगैर क्या हूं भी मैं?
इस जीवन के एक क्षण में थी उसकी उत्पत्ति
पर अब ना मेरे पास है
अस्तित्व का परिणाम वो
वो एहसास है
हर क्षण में न सही, पर क्षण क्षण में दिखा
जिंदादिली की खोज में
कभी अपने भीतर
तो कभी बंजर रण में दिखा
नगरों, लोगों लम्हों में ढूंढा
पर्वत वन और नभ में भी
जिसका वजूद ही मेरे भीतर था,
कैसे मिलता वो सागर में भी
परिवर्तन से भिन्न यह वो शून्य है
जो अनंत अवस्थाओं में भी अपरिवर्तित, अमूल्य है
अनुभव और सत्य की तरह अविकारी है
यह एहसास ही तुम्हारी चेतनाओं का अधिकारी है
इस कविता में उस अवस्था की बात हो रही है जब कोई एहसास का एक बार बहुत ही गहरा अनुभव करने के बाद हम दूसरी बार नहीं कर पाते। ये एहसास किसी प्रेम का अनुभव हो सकता है या किसी प्रेरणा का, या फिर किसी प्रेरणा रचित कार्य का। उस एहसास की कमी हमें इसी तरह खटकती रहती है।
By Anal Kishore Singh

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