एकलव्य
By Deepak Soni
'तीरों से है शक्ति जताना चाहेगें क्या मुझे सिखाना"
देख गुरूदेव क्रोध से बोले, भूलकर भी तू लौट मत आना । नियति की उसने न मानी, मूरत बना अभ्यास की ठानी ॥
एक पात्र लिखने लगा, धीरे - धीरे अपनी कहानी । मन ही मन हर्षाया था, की गुरू को समक्ष जब पाया था ।। जो कुछ भी उसने था सीखा, सब कुछ करके दिखाया था ।
बोलिए क्या चाहते हैं, कहने में क्यों सकुचाते हैं । निज प्राण भी दे दूंगा अभी, यदि आप वह चाहते हैं ।।
जग में उज्जवल हो जायेगा, कीर्ति सदा ही पायेगा । जो में मांगू तेरा अगूंठा, दान मुझे दे पायेगा ।
उज्जवल होने आया था, कीर्ति सदा ही पाया था । गुरूदेव ने मांगा अगूंठा, एकलव्य के हाथों पाया था ।।
By Deepak Soni

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