एक स्त्री
Updated: Sep 16, 2025
By Archana ( Archana writes)
अपने ही अस्तित्व को ढूँढती,
अपनी ही परछाई से भागती हैं ये,
हालातों का रोना हैं रोतीं,
पर स्वयं को मज़बूती से सँभालती है ये,
हज़ारो झंझवातों को हैं झेलती,
हज़ारो उलाहवने हैं सुनती,
फिर भी चट्टान की तरह अपने कदमों को बढ़ाती है यें,
दिल से बिलकुल नरम हैं ये,
पर होठों पर अंगार लिए,
तेरे ही संग आने को तैयार हैं यें,
दिल के किसी कोने पर तेरे ही दस्तक का इंतज़ार लिए,
चूल्हा चौका सँभालते हुए,
अपने मन में झॉकते हुए,
कुछ पल को ये बैठती हैं,
चाँद की ओर तकते हुए,
एक ही सवाल करती हैं,
क्यों औरत ही औरत से प्रश्न है करती,
हज़ारो की तादाद में उँगलियाँ वही उठाती हैं,
क्यों अपने ही अस्तित्व से वो ऐसा व्यवहार करती हैं,
क्यों अपने ही वज़ूद को झेल नहीं पाती हैं,
स्वयं से प्रेरणा लेकर क्यों नहीं बनती वो औरों की प्रेरणा,
क्यों शब्दों के बाण चलाती हैं,
क्यों नहीं समझती,
कि एक दिन ये शब्द लौट कर उसी की ओर आने हैं,
ज़िंदगी किसी का भी उधार नहीं रखती,
काश! एक औरत दूसरी औरत को समझ पाती,
दिल के किसी कोने पर दस्तक देते हुए,
हाथ थाम लें,
तो हर औरत वो संरक्षिका हैं,
जो दुनिया की काया पलट कर सकती हैं,
ऐसी हर औरत को मेरा सलाम,
जो तू, तुम और तुम्हारा ना होकर,
हम और हमारा का भाव लिए
संसार को एक करने का संकल्प लिए बैठी हैं।
By Archana ( Archana writes)

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