एक लड़की
By Shivangi Kaushik
छोटी छोटी चीजों से बहुत खुश हो जाती है,
लेकिन ज्यादा वक्त तक खुश रह भी नहीं पाती है।
अकेली पड़ जाती है अक्सर लोगों के दरमियान भी,
वो कभी खुलकर नहीं हस पाती है ।
लोगों के बीच बैठी खो सी जाती है,
बातें सुनती सुनती शून्य हो जाती है।
यह लड़की सब करना चाहती है,
उनकी बातें सुन अपनी बातें कहना चाहती है,
कोई हाथ बढ़ाएं तो हाथ मिला लेना चाहती है ।
लेकिन डरती है, डरती है लोगो के बेफिजूल तानो की वजह से, खोए हुए अरमानों की वजह से,
अब वो त्योहारों पर घर नहीं जाना चाहती, घर से दूर अकेले रहना चाहती है ।
सोचती है कि घर के शोर से बेहतर वो काला अंधेरा कमरा होगा।
वो अकेले रह सुकून तलाशना चाहती है।
वो चाहती है, वो सोचती है, वो करती है, वो रहती है,पर फिर वो सबकी अपनी जिंदगी है सोच खो सी जाती है
यह लड़की बहुत खुशबसूरत है जो बस थोड़ी सी इज्जत चाहती है।
वो चाहना नहीं चाहती पर फिर भी एक उम्मीद रखती है
वो बस एक खामोश साथ चाहती है।
वो कहती है कि कोई सुनले उसे उसी की तरह या कोई खामोश बैठ जाएं उसके पास उसी की तरह,
वो उम्र में बड़ी पर दिल से नन्ही सी परी बस इतना चाहती है।
By Shivangi Kaushik

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