एक रहस्यमयी ईद
By Abhishek Kumar 'Shahi'
एक पुराना घर जिसके दीवारों को बरगद अपने जड़ों में ऐसे जकड़े है जैसे अंधा धृतराष्ट्र अपने सौ पुत्रों के कातिल भीमसेन को अपने बाहों में जकड़कर ढहाना चाहता हो। जंगली लताएं उसे ऐसे घेरे हुए है जैसे वो नहीं चाहती कि इसपर किसी की नजर पड़े। उस घर की एक तस्वीर मैंने उसे भेजी और लिखा "ईद मुबारक"। ऐसा मैं पिछले तीन सालों से कर रहा हूँ। वो जवाब में दुआ में उठे हाथों के साथ अपनी तस्वीर भेजती है और कहती है "मुझे तो चांद का दीदार हो गया आप भी कर लो जी"। वो तस्वीरें उसकी ईद में चांद से कई ज्यादा महत्व रखती है। वो कहती है "बिना उसे देखे सेवइयों में कितना भी चीनी डालो फीका ही रहता है"।उससे पहली मुलाकात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हुई थी l उस वक्त मैं 8वीं या 9वीं में था , विद्यालय की ओर से एक विज्ञान संबंधी कार्यक्रम में बी.एच.यू. गया था । पर अपने वाद-विवाद में रुचि के कारण वहाँ हो रहे एक चर्चा में हिस्सा ले लिया। कार्यक्रम खत्म होते ही आसमानी रंग के कमीज-सलवार में एक लड़की पास की कुर्सी पर बैठी और नजर मिलते ही बोली "आपने बड़ा अच्छा बोला,यहीं के हो जनाब?" 8वीं कक्षा जीवन का वो पड़ाव होता है ,जहां उम्र यौवन का पहला वसंत महसूस कर रहा होता है।जब श्रृंगार रस की कविताएं समझ आने लगती है। जब बागों के गुलाब किसी के शर्माते कपोलों पर खिलते दिखायी देते हैं। जब भारी होता अपना आवाज किसी के मधुर कंठ के साथ ताल मिलाना चाहता है।जब अचानक बायोलॉजी काम का विषय मालूम होने लगता है। परिणामस्वरूप उम्र की चंचल उत्सुकता ने उस छोटे से प्रश्न पर 30-35 मिनट तक बात किया जिसमें से सामने वाले ने बमुश्किल 1-2 मिनट ही बोला होगा । अचानक मेरी नजर उसके नेमप्लेट पर गयी । "अल्का भगीरथ" , नाम उसके पहनावे और उर्दू लहजे से बिल्कुल मेल नहीं खा रहा था।मैं मन ही मन विचार कर रहा था कि ये मस्जिद में घण्टा किसने टांग दिया है। पर भाई सीधा मजहब कौन पूछे? वो भी लड़की से! और भला खूबसूरती का भी कोई महजब होता है क्या ! खुद को ये समझाते हुए मैंने पूछा "तुम कहाँ से हो"? हँसते हुए जवाब आया "पाकिस्तान से"। पाकिस्तान सुनते ही मेरे दिमाग में सनी देओल की फिल्में दौड़ने लगी। सनी देओल को देखकर ये प्रश्न हमेशा मस्तिष्क में कौतूहल मचाता था कि आजाद तो हम अंग्रेज से हुए फिर ये पाकिस्तान का हैंडपंप क्यों उखाड़ रहा है?दरअसल पाकिस्तान एक ऐसा विषय है जिसे लेकर सौ प्रतिशत भारतीय या तो गुस्से में है या उलझन में । मुझे लगा लड़की मजाक कर रही है। तो मैंने व्यंगय करते हुए कहा "बड़ा नजदीक का देश चुन ली , सोमालिया बगैरा चुनती ।" वो खिलखिलाकर हँसने लगी और बोली "अरे ! मैं सच में पाकिस्तान से हूं । अब्बू दूतावास में काम करते हैं ,अप्पी यहाँ पढ़ती है तो उसके साथ आज घूमने चली आयी।"मेरा दीमाग सन्न रह गया। पिताश्री हर गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर संजीदा भाषण लिखकर देते थे जिसमें मैं पाकिस्तान के हाथ-पैर उखाड़ने वाली शायरी घुसाता था क्योंकि उसके बिना दोस्त ताली ही नहीं बजाते थे। दिलोदिमाग में वही छवि बसी थी पाकिस्तान की , ये हजम ही नहीं हो रहा था कि कोई इतना मासूम दिखे ,इतना व्यवहार कुशल हो और पाकिस्तानी हो। फिर सोंचा होगा लंका में एकाध विभीषण । पर इतना बहलाने के बाद भी कंठ 'अच्छा' से ज्यादा नहीं बोल पाया। इसी बीच उसका अगला प्रश्न आया " आपका प्रोजेक्ट प्रेजेंटेशन कब है? टॉपिक तो अच्छा लग रहा है , अप्पी की क्लासेज रही तो मैं सुनने आऊंगी"। "अभी तो असम , आंध्र ,अरुणाचल जैसे 'ए' से नाम वाले राज्यों का चल रहा है, हमारा दो दिन बाद आएगा" मैंने जवाब में कहा। "अच्छा जी! पर ये तो बहुत बड़ा कैंपस है , मैं आ भी गयी तो ढूंढ नहीं पाऊँगी ,आप एक काम करो नम्बर देदो अपना , मेरे पास तो फोन नहीं है ,आऊंगी तो अप्पी के नम्बर से कॉल कर लूंगी"। मैंने नबंर देते हुए कहा "इसी नंबर से मेरा फेसबुक भी है , ऐड कर लेना।" "बनाउँगी तो जरूर ऐड कर लुंगी "ये कहकर वो चलने को हुई । मैंने मन में ही "अलैकुम अस्सलाम" दोहरा लिया सोंचा विदा लेने वक्त सलाम के जवाब में बोला जाएगा । पर उधर से "अल्लाह हाफ़िज़" आया। तैयारी के साथ धोखा हो गया। खैर ऐसी मुसीबतों में अंग्रेजी ही काम आती है सो बाय(bye) बोलकर मैंने मामला निपटाया।
अंतः वो दिन आ गया जिसके लिए हम बी.एच.यू.आए थे। मैं हॉल बैठा होने वाली हर आहट के साथ दरवाजे को देखता कि कहीं वो आयी तो नहीं। फिर एक बार पूरे हॉल में नजर दौड़ाता कि हो सकता है आयी हो पर नजर से चूक गयी हो।पर यौवन की निगाहे तो बर्बरीक के बाण की तरह होती है खूबसूरती का कोई पत्ता इससे कैसे कैसे चूक सकता है भला। उसके बाद हमारी कोई बात नहीं हुई। ऐसा लगा कोई मुसाफिर सफर में चढ़ा , साथी बना और अलविदा कहकर उतर गया। इस बात को तीन साल बीत चुके थे कि एकदिन मेरे फेसबुक पर एक संदेश आया "अभिषेक पहचाने?" ।मैंने प्रोफाइल खोलकर देखा , "फ़तिमा शेख ;हैदराबाद, पाकिस्तान"। मुझे लगा कोई फिरकी ले रहा है नहीं तो मेरे जैसे इंसान को कोई पाकिस्तान से क्यों याद करेगा! फिर मैं और बारीकी से जांचा सारी टिप्पणियाँ पाकिस्तान से ही थे। प्रोफ़ाइल जाली नहीं लग रहा था। मैंने जवाब दिया"नहीं"। फिर से संदेश आया ,"हिंट दूं"। मैंने 'हां' में उत्तर दिया। "बी.एच.यू. में मिले थे हम"। ये पढ़ते ही दीमाग पल भर में तीन साल पहले "बी.एच.यू. परिसर" चला गया। ऐसा लगा मैं हॉल में जिसका इंतजार कर रहा था वो किसी काम में व्यस्त थी और थोड़ा देरी से आयी है। कई सवाल टाइप होने के लिए धक्कामुक्की करने लगे। पर सबको किनारे करके मैंने पूछा पर तुम्हारा नाम तो 'अल्का' था ये 'फ़तिमा'? "बुद्धू , अल्का भारत के लिए था पाकिस्तान में फ़तिमा " एक उदासीन हंसी के साथ जवाब आया। एक सवाल से जो बातें शुरू हुई थी वो रोज घण्टों होने लगी। पाकिस्तान समझने में उसने मेरी जितनी मदद की इतिहास की कोई किताब नहीं कर सकती। और सच तो ये है कि जो जितना अच्छा पाकिस्तान समझ लेगा उसे हिंदुस्तान से उतनी ज़्यादा मोहब्बत हो जाएगी। 2-3 महीने बाद उसके अब्बा और अप्पी भी जुड़ गए मेरे प्रोफइल में। उसका अब्बा तो अजब ही था , बाग-बगीचे ,गाय-गोबर से लेकर होली-दीवाली तक मेरी हर तस्वीर पर अपना फेसबुकिया अंगूठा लगता था।इसी बीच दोस्तों के साथ फिर वनारस जाना हुआ। एक ने बताया कि जहाँ हम रुके थे वहां पास में ही भूत बंगला है । फिर क्या था तय हो गया कि आज भूतों को भी चिकन की दावत दी जाएगी। रात 9 बजे तक हमने भूत बंगले में खूब धूम मचाया , तस्वीरें खिंचवाई , पर कोई भूत नहीं फ़टका। भला इंसानो से कौन नहीं डरता है। थके-हारे हम वापस आकर सो गए। सुबह जैसे ही फोन हाथ में लिया लिया। अल्का का 12 miss कॉल औऱ पांच बार एक ही सवाल "ये तस्वीर कहाँ की है?" मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ पर मैंने भूत बंगले वाली कहानी सुना दी। "एक वीडियो बनाकर दो न उस बंगले का" अल्का का उत्तर आया। अब फिर से कौन जाए भला , वनारस में स्वयं भूतनाथ महादेव विराजमान हैं तो फर्जी भूतों के पीछे इतना वक्त कौन बर्बाद करे।पर वो जिद करने लगी तो पूछना लाज़मी हो गया कि भला ऐसा क्या है उन तस्वीरों में ! जवाब आया " अब इस्लाम में तो भूत का कोई किरदार है नहीं तो मुझे भूत बंगला देखना है।" "इंसान ही इतने खतरनाक पैदा कर रखे हैं तुम्हारे कट्टरपंथियों ने की भूत की जरूरत ही क्या है" मैंने कटाक्ष के लहजे में कहा। अगले दिन मैं वहां जाकर उसे डरावनी आवाज के साथ छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स भेजने लगा। दसियों वीडियो मैं भेज दिया पर मुकम्मल धन्यवाद तक नहीं आया। मेरे आश्चर्य की घड़ी ने अब शक की सुई लगा ली। ऐसा उदासीन व्यवहार क्यों?सहसा व्हाट्सएप की घण्टी बजी , एक नया संदेश आया ,"दूसरे मंजिल के कोने वाले हॉल की खिड़की से देखो घाट दिखते हैं क्या?" इस प्रश्न की घंटी ने दीमाग की घंटी बजा दी, शक की सुई ने सेकंड की सुई से तेज रफ्तार पकड़ ली। जिसे मैं वर्षों से जानता था उससे अनजान बनकर पूछा "कौन हो तुम"?, "तुम्हें ये सब कैसे पता?" "जासूसी कर रही हो?" शक का बीज तो चट्टान जैसे मजबूत रिश्तों को मटियामेट कर देता है फिर इसमें तो पहले से सरहद की दरारें थी। "अरे मैं भी वनारस रही हूं , क्यों नहीं पता हो सकता"! इस अस्पष्ट से जवाब ने शक को और खाद दिया। "हां तो वनारस में देखने लायक और भी बहुत कुछ है इस खण्डर में ऐसा क्या है"। "कुछ नहीं है तुम भेजोगे वीडियो या नहीं" उसका व्यवहार अजीब रूप से बदलने लगा । अदब के लहजे में झुँझलाहट झलक रही थी । 'आप' नीचे उतरकर 'तुम' पर आ गया था। मैंने पुरानी भेजी वीडियो भी डिलीट की और बोला कि बिना सच बताए मैं कुछ नहीं भेज रहा। अचरज वाली इमोजी के साथ उत्तर आया "अभी नहीं बता सकती वक्त पर पता चल जायेगा"। "वीडियो डीलिट क्यों किया ? वापस भेजो, जो भेजा था वो तो रहने देते कमसेकम"।मेरे शक के घरौंदे में यकीन अपना आशियाना बनाने लगा। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि मुझे मोहरा बनाकर जासूसी की जा रही है । एजेन्टस की सारी फिल्में एक साथ दीमाग में चलने लगी । कैसे जासूसी होती है , इनपुट मिलता है, फिर आतंकी हमला होता है ,सब साफ-साफ सामने दिखने लगा। फिर भी दिल को तस्सली का एक और सबूत देने के लिए मैं उस हॉल में गया जहाँ खिड़की पर एक पुरानी दूरबीन सा कुछ था ,जिससे झांकने पर पूरा घाट साफ-साफ दिखता था। अच्छा तो घाट पर बम लगाने का षड्यंत्र था ,और ये खंडहर आतंकी अड्डा था ,इसलिए भूतबंग्ला का अफवाह उड़ाया गया ताकि कोई इधर आये नहीं। आतंकी अध्याय की पूरी पटकथा मेरे दीमाग में चलने लगी ,और दिल ये सोंचकर बैठ गया कि कुछ भी अनर्थ हुआ तो मेरा क्या होगा? लोग क्या सोचेंगे कि मैं सरहद पार की एक लड़की के लिए देश से गद्दारी कर रहा था। दुनिया के सारे कुकर्म वक्त के साथ धूल जाते हैं पर देश से गद्दारी का कलंक पीढ़ियों तक पीछा नहीं छोड़ता। गलती से भी मेरा नाम आ गया तो कौन मेरी बातों पर यकीन करेगा! ये सोंचकर अंतरात्मा कांप गयी। "हे भोलेनाथ! ये किस चक्कर में फंस गया मैं " इन विचारों ने हृदय में ऐसे उथलपुथल मचा दिया जैसे घाट से पहले बम मेरे अंदर फट गया हो। बुध्दि शून्य हो गयी। सोंचा पुलिस को बता दूं सब , "पर ये सेक्युलर सरकार की पुलिस उल्टा मुझे ही फंसा देगी" ये सोंचकर वो भी नहीं किया। "अरे थोड़ा इतिहास ही तो पढ़ाया है और चंद तस्वीरें भेजी है , वो भी डिलीट कर दिया , भला इतने में कोई क्या ही जासूसी कर लेगा" , ये सब कहकर मैं खुद को बहलाने लगा। पर अविश्वास की क्रोधाग्नि जल रही थी। "विषैले नाग को दूध पिला तो एक बार को वो अपने हो सकते हैं पर ये आतंकी कभी नहीं" ।"तुम फ़तिमा हो अल्का नहीं" इतना लिखकर मैंने उसे ब्लॉक कर दिया। बी.एच.यू. के हॉल से शुरु हुई ये अनोखी मुलाकात इस खंडहर के हॉल में खत्म हो गयी। पहली बार मैं उसे एक पाकिस्तानी की नजर से देख रहा था। इतने दिनों में हमने पाकिस्तान , कट्टरपंथ, इस्लाम सबपर खुल के बात की ,और जो-जो टिप्पणीयां की उसपर तो हिंदुस्तानी मुसलमान बुरा मान जाये पर उसने ज्यादातर सच कि सहमति में हामी ही भरी, जब कुछ ज्यादा कड़वा बोल जाता था तो बस इतना कहती "क्या करें अब खुदा ने सारे जाहिल गधों को हमारे यहाँ की पटका है तो"। कभी उसकी बदनीयती का एहसास ही नहीं हुआ ।भला यही तो खूबी होती है जासूसी की अब हमारे जैसे आदमी भी जासूस पकड़ ले फिर किस बात के जासूस वो। उस दिन से एक अजीब सा डर मेरे अंदर घर जर गया। दरवाजे पर होता हर अनजान दस्तक से ऐसा लगता मानों पुलिस गिरफ्तार करने आयी हो।आतंक और जासूसी से जुड़े हर मामले को बड़ी बारीकी से खबरों में देखने और पढ़ने लगा।पर जब महीनों तक कोई अप्रिय घटना नहीं हुई तो ये डर धीरे-धीरे जाता रहा। फिर एक दिन खबर छपी कि वनारस के मणिकर्णिका घाट पर दो पाकिस्तानी जासूस पकड़े गए हैं। संपोले फन फैलाने से पहले ही पकड़ लिए गए ,ये खबर मेरे लिए अद्भुत निश्चिंतता लेकर आया । मैं अपनी सामान्य जिंदगी में वापस लौटने ही लगा था कि एक दिन +92 कोड वाले नम्बर के साथ फोन बजने लगा।देखते ही मैं समझ क्या कि किसका फोन है ,पर इस बार मैं काफी सर्तक था ,दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है ।'हेल्लो'कहने से पहले मैंने रिकॉर्डर चालू किया। एक जानी फहचानी आवाज ने बड़ी उत्सुकता से पूछा "कहाँ हो जनाब"? मेरे राष्ट्रवाद से लदे कंठो ने जवाब दिया "हिंदुस्तान में मोहतरमा,उस हिंदुस्तान में जिससे गद्दारी करके तुम्हारे पुरखे भाग गए, पर ये साजिशें अब सफल नहीं होगी"। "छोटे से सवाल का लंबा जवाब देने की आदत गयी नहीं गयी है आपकी,पुरखे भागे होंगे पर हम तो यहीं है हिंदुस्तान में ,विश्वास नहीं है तो ये सुनिए , " । "लंका गेट ,लंका गेट" ऑटो वाले कि ये आवाज उसके वनारस में होने का सबूत दे रहे थे। जो बी.एच.यू. जानते हैं वो "लंका गेट" जानते हैं। "फिर से जासूसी करने आ गयी"? मैंने सीधा सा प्रश्न किया। "अरे आकर मिलिए तो जनाब सब बताऊँगी ; जासूस-गद्दार आपके देश आयी हुई है और आप पकड़ने के वजाय फिल्मी डायलॉग दे रहे हैं , कैसे राष्ट्रवादी हैं आप"? "आते है , पकड़ेंगे ,जरूर पकड़ेंगे" ये कहकर मैं फोन रख दिया। "सरकार जासूसों को कैसे बीजा दे देती है ? पर जासूस ऐसे खुलेआम सड़क पर कैसे घूम सकता है? रमजान का महीना है चहलपहल रहती है , छुपने में आसानी होगी इसलिए आये होंगे।" ये सारी बातें आँख नहीं लगने दे रही थी। जिस मुसीबत से मैं बचा था वो फिर मुझे पास बुला रही थी। पर सवाल इतने ज्यादा और इतने पेचीदे थे कि बिना मिले चैन भी नहीं था। अगली सुबह निकल लिया वनारस की ओर ,एक विश्वासपात्र मित्र को सारी कहानी सुनाई , और उससे कहा कि "उससे मिलते वक्त मैं तुम्हें कॉल करके छोड़ दूंगा ,तुम बिना बोले ध्यान से सब सुनना और रिकॉर्ड करना सब।" व्हाट्सएप पर दुबारा सम्पर्क करके हमने मिलने का जगह-समय तय किया। जब मैं पहुँचा तो देखा कि वो अपने अब्बा और अप्पी के साथ बी.एच.यू. के हैदराबाद गेट के पास खड़ी थी। मिलते ही बोली चलिए जनाब चलते हैं आपका भूतबंग्ला , आपके सारे जवाब वहीं मिलेंगे शायद। मैं उन्हें उस खंडहर तक ले आया। वो उसे ऐसे निहार रहे थे जैसे ताजमहल देख रहे हों , उसके चारों घूम रहे थे , काई लगे उसे जर्जर दीवारों को ऐसे चूम रहे थे जैसे काबा की दीवार हो। वो सीढ़िया चढ़ने लगे ,कभी इस कमरे ,कभी उस कमरे जैसे कोई अनमोल वस्तु ढूंढ रहे हों । मैं पूछ बैठा "क्या छिपा रखे को यहाँ , हथियार या कोई गुप्त नक्शा ?"बोलो जवाब दो" ? उसका अब्बा बोल पड़ा "जरा सब्र रखो जनाब , सब बताएँगे ,पहले खुद तो तसल्ली कर लें।"जो भी वहाँ हो रहा था मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं खिड़की के पास खड़ा उनकी संदिग्ध गतिविधियों को हैरत से देख रहा था। अचानक तीनों ने एक दूसरे को अजीब से देखा और गले मिले। हैरत अब डर का स्वरूप ले चुका था , दीमाग की बत्ती ने पैर से कहा भाग ये मानव बम है फटने वाले हैं। मैं खिड़की से खुद पड़ा ,जितनी दूरी सुरक्षित समझ आयी उतनी दूरी तक भागा और जमीन पर कान बंद करके लेट गया। कुलदेव ,इष्टदेव ,महादेव सब एकसाथ याद आने लगे ,डर के मारे महामृत्युंजय का जाप करने लगा । यूँही पड़े -पड़े 5-7 मिनट बीत गया पर पटाखे फूटने की भी आवाज नहीं आयी। उठकर देखा तो हाथ में एक बड़ी सी तस्वीर लिए तीनों मेरी ओर बढ़ रहे थे। मैं उनकी ओर लपका औऱ तस्वीर छीन कर बोला "क्या है ये ?कहाँ का नक्शा है?देखो सच बता दो मेरा दोस्त फोन पर सब सुन रहा है, पुलिस लेकर आएगा वो , अब बच नहीं पाओगे तुमलोग।" "ये तस्वीर है हमारी और ये हमारा पुश्तैनी घर" , बाप उस भूतबंग्ले की ओर इशारा करके बोला। पहले ही दीमाग का सारा पुर्जा हिला हुआ था ,एक नई पहेली और आ गयी । मैं झुँझलाते हुए बोला "देखो पहेली बंद करो साफ-साफ बताओ ,क्यों बुलाए हो?" " अंदर चलो जनाब सब बतातें है , सीढ़ी पर बैठकर उसका बाप कहने लगा " बँटवारे के बाद हमारे दादा भागकर पाकिस्तान चले गए ,चिड़िया मौसम प्रतिकूल मालूम होने पर उड़कर मीलों दूर चली जाती है ,पर वापस अपने घोंसले को आती है , जब चिड़िया अपना घोंसला नहीं भूलती तो भला इंसान इतनी आसानी से आपना घर कैसे भूल सकता है ? दादाजी बार-बार हाजी अली की दरगाह पर चादर चढ़ाने आते थे और जब भी आते तो हमें इस घर में लेकर आते ,और घंटो कहानियां सुनाते।चिड़ियां सरहदें नहीं खिंचती इसलिए आसानी से अपने घोंसले में लौट सकती है ,पर हम चाहकर भी नहीं लौट सकते थे। पाकिस्तान के हालात बत्तर होने लगे । खूनी तारीखें रोज खुद को दोहराने लगी। काफ़िर बताकर जिस कट्टरपंथ ने गैर-मुसलिमों का कत्लेआम किया था वो अब इस्लामी फिरकों में भी काफ़िर ढूंढने लगा। मैं 9-10 साल का था , हम जुम्मे की नमाज से लौट रहे थे कि एक खूनी भीड़ मुहाजिर कहकर हमारी ओर दौड़ी , देखते-देखते बमों से मस्जिद की दीवारें थर्राने लगी। दादाजी का चश्मा आंखों सहित बाहर आ गया। डर से मैं बेहोश गया। आंख खुली तो अस्पताल में पड़ा था जहां एक विस्तर पर अपंग वालिद थे और बाहर मौलवी दादाजी के नमाज़ ए-जनाज़ा में शरीक होने का संदेश दे रहे थे। जिंदगी तवाह हो चुकी थी। एक दिन मैं गुस्से में वालिद को बोला "सबसे बदला लूंगा मैं"। "वालिद ने पास बुलाया और कहा किससे बदला लोगे ? ये तो अल्लाह का कहर बरपा है हमपे , जो गद्दारी हमने हिंदुस्तान से की है उसकी सजा है ये ।" वो जबतक जिंदा रहे हमें आजादी और हिंदुस्तान की कहानियां सुनाते रहे ,फिर एक दिन बोले बेटा अब कब्र में जाने का फरमान आ गया है , पर हिंदुस्तान में एक भगीरथ हुए जिनकी कई पीढ़ियों ने अपने पुरखों को गुनाह से मुक्त करने लिए तपस्या की और देवी गंगा को धरती पर उतारा। हमारे गुनाह को कोई गंगा धो नहीं सकती क्योंकि हमने कई लाख लोगों का खून और आसूं बहाकर सरहद की ये वैतरणी खींची है , न जाने कितनी पीढियां इसमें डूबेगी तब हम उसपार गंगा तक पहुँच पाएंगे। पर तुम भगीरथ का रास्ता मत छोड़ना ।" ये कहते हुए उन्होंने सांसे छोड़ दी। जो कहानियां मैंने अपने वालिद से सुनी वो अपने औलादों को सुनाया । बेटी का नाम "अल्का भगीरथ" रखा ।भारतीय दूतावास में नौकरी कर ली। वर्षों वनारस में भटका , घर तो याद था पर बचपन की स्मृतियों से रास्ता मिट चुका था। फिर भारत की सरकार बदल गयी साथ ही पाकिस्तानी राजदूत भी, हमें वापस पाकिस्तान जाना पड़ा । पर आपकी तस्वीरों में हम हिंदुस्तान को ढूंढते रहे ,अपनापन महसूस करते रहे कि एकदिन आपके भूतबंग्ले में मुझे अपना घर दिख गया। हम खुद को रोक नहीं पाए और यहाँ आ गए , आपना नहीं रहा अब ये ,पर देख तो सकते है न इस घर को। हम जासूस या आतंकवादी नहीं है ,बस अपना घर खींच लाया हमें, क्या करें पाकिस्तान हमें मुहाजिर कहता है और हिंदुस्तान आतंकवादी, अपना घर कहीं नहीं रहा हमारा ।खैर हमारे पुरखों के कारण बहुतों घर उजड़े हैं ,उसकी सजा तो मिलेगी ही। ये कहते-कहते उनकी आँखें भर आयी। ग्लानि से मेरा दिल भर आया , मैं माफी मांगना चाहता था पर , रुद्न कंठो से कोई शब्द निकल नहीं पा रहा था। अचानक वो मेरे पास आये और हाथ चूमकर बोले , शुक्रिया आपका कि आपने हमें फिर से हमारा घर दिखा दिया। पता है आज चांद दिखने के बाद कल ईद मनेगी , वर्षों से इस घर के छत से किसी ने ईद का चांद नहीं देखा है ,आज देखेंगे , फिर कल यहीं सेवइयां बनायेंगे , आप रुकेंगे कलतक? " जी मैं भी आज इस छत से आपके साथ चांद देखूँगा, सब के चेहरे पर मुस्कुराहट का नूर सा छा गया , जैसे चांदनी उतरी हो चेहरे पर। मेरा दोस्त फोन पर सब सुन रहा था , वो भी आ गया। हमने चांद भी देखा और सेवइयां भी खाई। अल्का बोली पता है आजतक किसी ईद पर इतनी मीठी और स्वादिष्ट सेवईयां नहीं बनी है। दो दिन बाद वो वापस पाकिस्तान चले गए ,मैं भी वनारस से बहुत दूर रहता हूं , पर हर ईद पर मेरा दोस्त उस घर की छत से चांद देखता है , चांद के साथ घर की तस्वीरें लेता है और मुझे भेजता है , जिसे मैं सरहद पार भेजकर लिखता हूँ "ईद मुबारक"।
By Abhishek Kumar 'Shahi'

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