"एक बस" - By Shiv Shanker
Written By: Shiv Shanker
Category: Poetry
Competition: Poetry and Creative Writing Competition 2026
In the realm of poetic expression, Shiv Shanker presents "एक बस," an evocative piece part of the Poetry and Creative Writing Competition 2026 hosted by Hashtag Kalakar. This poetry captures the essence of urban life's relentless pace, juxtaposed with the yearning for roots and simplicity. Through vivid imagery and heartfelt verses, Shiv Shanker invites readers to reflect on the everyday struggles and dreams carried by the metaphorical bus.
About the Work
"एक बस" by Shiv Shanker is a poignant exploration of the contrast between urban hustle and ancestral ties. The poem uses the recurring image of a bus to symbolize the journey between these worlds, weaving a tapestry of emotions ranging from longing to resilience. With a graceful and rhythmic style, it delves into themes of migration, nostalgia, and the elusive concept of home.
"एक बस"
Original Submission by Shiv Shanker
"एक बस"
दिख जाती है अक्सर एक बस,
मुसाफ़िरों से भरी ठसाठस।
जब मैं लौट रहा होता हूं,
दफ्तर से थका-हारा, बेबस।।
हो जाता हूंँ जब लेट-लतीफ,
मंजिल और दूर आती है नजर।
और जिम्मेदारियों का बस्ता टांगें मैं,
गुमशुदा-सा खड़ा रहता हूंँ, चौराहे पर।।
साधन के इंतजार में,
रास्ता निहारती मेरी बैचेन आंखें।
सामने से गुजरती बस पर,
ठहर जाती हैं जाके।।
और देखती रहती हैं बस को एकटक,
जब तलक वो ओझल नहीं हो जाती।
क्योंकि ऐसी ही एक बस,
मेरे गांव तक भी है जाती।।
हाँ, हुबहु ऐसी ही बस,
जाती है मेरे गांव को।
तपती शहरी दोपहरी से,
सुकून भरी ठंडी छांव को।।
और बस के सब मुसाफ़िर,
मुझे लगते हैं मेरे अपने।
होते रहे जो दरबदर उम्र भर,
लेकर बसने-बसाने के हसीन सपने।।
शहर के ये घर,
जैसे चिलचिलाती धूप में,
फ़कत कटता जीवन का सफर।
बस घर से दफ्तर,
और दफ्तर से वापिस घर।।
ज़ुस्तज़ू अजब, सुकून नदारद।
बेरहम रोजमर्रा, तड़प हृदय विदारक।।
तड़प और सुकून के दरमियां,
वास्ता है कई पीढ़ियों का।
एक फासला फर्श से अर्श तक,
और अर्श से फर्श तक जाती सीढ़ियों का।।
सीढ़ियां, जो दिखा रही हैं,
परदेसी के जीवन का उतार-चढ़ाव।
जैसे कोई बस गांव से चली हो शहर को,
और लौट रही हो वापस गांव।।
वो बस, जो जोड़े हुए है,
दो अलग दुनिया एक साथ।
जिनके परिवेश में है दशकों का अंतर,
पर सफर महज एक रात।।
वो बस, जो काम की तलाश में,
कुछ पुरखों को ले आई,
निष्ठुर मायावी नगरी में।
बंधुआ किसानी से बेहतर,
पर बदतर बंधुआ मजदूरी में।।
वो बस, जो रुढ़िवादी समाज से सताए,
किसी परिवार को ले आई,
सौरंगी संगम के घाट पर,
घुटन छोड़, जिंदगी का आचमन कराने।
मानसिक आजादी की उम्मीद छोड़ चुके,
जबरन बनाए कैदियों को,
जीने की नई राह दिखाने।।
वो बस, जो किसी भाई, किसी बाप को,
ले आई उनकी जड़ों से बड़ी दूर।
बहन-बेटी ब्याहने की जुगत में,
चौतरफा जो थे बड़े मजबूर।।
वो बस, जो कुटुम्ब के ज्येष्ठ को,
टूटी कोठरी न बनवा पाने की ठेस को,
ले आई परदेस को,
छोटे-छोटे सपनों को सजाने।
लड़कपन में डूबे बचपन को,
जिम्मेदारियों का एहसास दिलवाने।।
वो बस, जिसने किसी मेहरिया के मनसवा को,
बनाए रखा ताउम्र परदेसी।
देर-सबेर विरह की पीड़ा बताता,
आंसुओ से भीगा वो पत्र अंतर्देशी।।
वो बस, जो आती है मेरे गांव से,
और जाती है मेरे गांव तक।
भरी रहती है मुसाफ़िरों से खचाखच,
जगह बचती नहीं जिसमें रखने को पांव तक।।
वो बस, जिसने न जाने कितनी,
आशाओं- उम्मीदों को ढोया है।
न जाने कितने रिश्ते तोड़ दिए,
टूटी माला में कितने ही मनकों को पिरोया है।।
वो बस, जो तय कर चुकी है,
न जाने कितने बरसों का सफर।
न जाने कितनी रातें ढलती देखीं जिसने,
देखें न जाने कितने महकते फ़जर।।
दशकों बाद भी जरूरतों का ये सफ़र,
अविलंब चलता रहा।
जीने की फ़रेबी कशमकश में,
जीवन का अंतः सुख लुटता रहा।।
ये तड़प, ये भटकाव, ये सूनापन,
खो गया हो जैसे किसी के हिस्से का सावन
बस मनभावन स्मृतियां मन में संजोए,
कहीं कट रहा हो जैसे नीरस जीवन।।
रोज नियम से आना वापस,
किराएदार के माफिक शहरी घर।
असली घर जाने में फिर भी,
हरदम रह जाती है कोई कसर।।
शहरी घर, जिसने जरुरत की बेड़ियों से,
बांधा हुआ है सबको।
जीने की जालिम जद्दोजहद में,
संभाला हुआ है सबको।।
फिर भी जेल की कैद सी,
ये शहरी जिंदगी लगती धोखा है।
इस बर्बर सफर ने 'दरबदर राही' को,
असल घर जाने से रोका है।।
और इस भंवर में,
दिख जाती है अक्सर एक बस,
मुसाफ़िरों से भरी ठसाठस।
जब मैं लौट रहा होता हूं,
दफ्तर से थका-हारा बेबस।।
About the Competition
The Poetry and Creative Writing Competition 2026 by Hashtag Kalakar celebrates diverse voices and creative expressions. It is a platform where poets and writers from around the world share their unique perspectives and literary crafts. This competition emphasizes creativity, originality, and the power of words in storytelling and poetic expression.
We extend our heartfelt thanks to Shiv Shanker for sharing "एक बस" with us in the Poetry and Creative Writing Competition 2026. His contribution enriches the tapestry of voices and themes explored in this event. We look forward to seeing more of his insightful work in the future.
About Hashtag Kalakar
Hashtag Kalakar is a creative platform dedicated to providing artists, writers, singers and other creative talents with opportunities to showcase their work and reach wider audiences through competitions, features and creative initiatives.

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